महावीर

March 3, 2008

तिरे सांसों की ख़ुश्बू - ग़ज़ल.

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 5:50 pm

तिरे सांसों की ख़ुश्बू - ग़ज़ल.

तिरे सांसों की ख़ुश्बू से ख़िज़ाँ की रुत बदल जाए,
जिधर को फैल जाए, आब-दीदा* भी बहल जाए।

(*आब-दीदाः जिसकी आंखों में आंसू भरे हुए हों)

ज़माने को मुहब्बत की नज़र से देखने वाले,
किसी के प्यार की शम.आ तिरे दिल में भी जल जाए।

मिरे तुम पास ना आना मिरा दिल मोम जैसा है,
तिरे सांसों की गरमी से कहीं ये दिल पिघल जाए।

कभी कोई किसी की ज़िन्दगी से प्यार ना छीने,
वो किस काम का जिस फूल से ख़ूश्बू निकल जाए

तमन्ना है कि मिल जाए कोई टूटे हुए दिल को,
बनफ़्शी हाथों से छू ले, किसी का दिल बहल जाए।

ज़रा बैठो, ग़मे-दिल का ये अफ़साना अधूरा है,
तुम्हीं अंजाम लिख देना, मिरा गर दम निकल जाए।

मिरी आंखें जुदा करके मिरी तुर्बत* पे रख देना, (*क़ब्र, मज़ार)
नज़र भर देख लूं उसको, ये हसरत भी निकल जाए।

महावीर शर्मा

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