महावीर

February 17, 2008

वैलंटाइन के अंतिम दिन

Filed under: कहानी, महावीर शर्मा, लेख — महावीर @ 8:17 pm

‘वैलंटाइन के अंतिम दिन’
महावीर शर्मा

वैलंटाइन कारागार की कोठरी में फ़र्श पर बैठा हुआ था। जीवन के अंतिम दिनों को गिनते हुए आने वाली मौत की कल्पना से हृदय की धड़कनों की गति को संभालना कठिन हो रहा था। बाहर खड़े लोग खिड़की की सलाखों में से फूल बरसा रहे थे, उसकी रिहाई के नारों से चारों दिशाएं गूंज रही थीं। उसी समय सैनिकों की एक टुकड़ी ने आकर बिना चेतावनी दिए ही इन निहत्थे लोगों पर डंडों की वर्षा कर, भीड़ को तितर बितर कर दिया।

वैलंटाइन गहरी चिंता में सिर को नीचे किए बैठा हुआ था। अचानक दरवाज़ा खुला तो देखा कि कारापाल एक युवती के साथ कोठरी के अंदर प्रवेश कर रहे थे। कारापाल ने वैलंटाइन को अभिवादन कर नम्रता के साथ कहा, ‘पादरी, यह मेरी बेटी जूलिया है। आप विद्वान हैं। आप धर्म, गणित, विज्ञान, अर्थ-शास्त्र जैसे अनेक विषयों के भंडार हैं। अपने अंतिम दिनों में यदि आप जूलिया को इस असीम ज्ञान का कुछ अंश सिखा सकें तो आजीवन आभारी रहूंगा। सम्राट क्लॉडियस की क्रूरता को कौन नहीं जानता, मैं उसके नारकीय निर्णय में तो हस्तक्षेप नहीं कर सकता किंतु आप जब तक इस कारागार में समय गुजारेंगे, उस समय तक आपकी सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाएगा।’

वैलंटाइन की भीगी आंखें जूलिया की आंखों से टकराईं किंतु जूलिया के चेहरे के भाव-चिन्हों में कोई बदलाव नहीं आया। जेलर ने बताया कि जूलिया आंशिक रूप से अंधी है। उसे बहुत ही कम दिखाई देता है। अगले दिन की सांय का समय निश्चित होने के बाद जूलिया और जेलर चले गए। दरवाज़ा पहले की तरह बंद हो गया। इसी प्रकार जूलिया हर शाम वैलंटाइन से शिक्षा प्राप्त करती रही।

उसी समय वैलंटाइन ने ऊंचे स्वर में कहा,
“मेरे इस पवित्र अभियान को आंसुओं से दूषित ना करो। मेरी इच्छा है कि प्रेमी और प्रेमिकाएं हर वर्ष इस दिन आंसुओं का नहीं, प्रेम का उपहार दें। शोक, खेद और संताप का लेश-मात्र भी ना हो।”

यह घटना तीसरी शताब्दी के समय की है। रोमन काल में सम्राट क्लॉडियस द्वितीय की क्रूरता से दूर दूर देशों के लोग तक थर्राते थे। उसकी महत्वाकांक्षा का कोई अंत नहीं था। वह चाहता था कि एक विशाल सेना लेकर समस्त संसार पर रोमन की विजय-पताका फहरा दे। उसके समक्ष एक कठिनाई थी। लोग सेना में भर्ती होने से इंकार करने लगे क्योंकि वे जानते थे कि क्लॉडियस की वजय-पिपासा कभी समाप्त नहीं होगी, सारा जीवन विभिन्न देशों में युद्ध करते करते समाप्त हो जाएगा। अपने परिवार और प्रिय-जनों से एक बार विलग होकर कभी भी मिलने का अवसरनहीं मिलेगा।

इसी कारण, क्लॉडियस ने रोम में जितने भी विवाह होने वाले थे , रुकवा दिए। शादियां अवैध करार कर दी गईं। पति या पत्नी शब्द का अब कोई अर्थ नहीं रहा। जनता में चिंता की लहर दौड़ गई। यदि कोई विवाह करता पकड़ा जाता तो उसके साथ विवाह सम्पन्न करने वाले पादरी को भी कड़ा दण्ड दिया जाता। युवक उनकी इच्छा के विरुद्ध सेना में भर्ती कर लिए गए। कितनी ही युवतियों ने अपने प्रियतम के विरह में मृत्यु को गले लगा लिया।

प्रथा के अनुसार लड़के और लड़कियां अलग रखे जाते थे। 14 फरवरी के दिन विवाह की देवी ‘जूनो’ के सम्मान में नगर के सब व्यवसाय बंद कर दिए जाते थे। अगले दिन 15 फरवरी को ‘ल्यूपरकेलिया’ का उत्सव मनाया जाता और सांय के समय रोमन लड़कियों के नाम कागज़ की छोटी छोटी पर्चियों पर लिख कर एक

प्रेम की वेदी पर शहीद होने वालों पर मातम नहीं किया जाता, प्रेम की लौ जलाए रखते हुए गौरव और प्रेमोल्लास से उत्सव मना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।

बड़े बर्तन में रख दिए जाते। युवक बारी बारी एक पर्ची निकालते और उत्सव के दौरान वह उसी लड़की का साथी बना रहता। यदि साझेदारी प्यार में बदल जाती तो दोनों चर्च में जाकर विवाह-बंधन में बंध जाते। क्लॉडियस के इस निराधार कानून के कारण ल्यूपरकेलिया का यह त्यौहार समाप्त होगया।

वैलंटाइन ने प्रेमियों के दिलों में झांक कर उनकी व्यथा को देखा था। जानता था कि हृदयहीन क्लॉडियस का यह कानून अमानवीय था, प्रकृति के प्रतिकूल था, सृष्टि यहीं रुक जाएगी! पादरी होने के नाते, वैलंटाइन सेंट मेरियस के सहयोग से इस कानून की अवेहलना करते हुए अपने चर्च में गुप्त-रूप से युवक और युवतियों के विवाह करवाते रहे।

एक अंधेरी रात में जब चंद्रमा अपनी चांदनी के साथ शयन कर रहा था, झंझावात के साथ मूसलाधार वर्षा ने मानो सारे नगर को डुबोने की ठान ली हो। सेंट मेरियस उस रात कार्यवश कहीं दूर चले गए थे। वैलंटाइन मोमबत्ती के धीमे से प्रकाश में एक युवक और युवती के विवाह की विधि संपूर्ण ही कर पाए थे, क्लॉडियस के सैनिकों के पदचाप सुनाई दिये। वैलंटाइन ने दोनों को चर्च के पिछले द्वार से निकालने का प्रयत्न किया किंतु जब तक सैनिक आ चुके थे, दोनों वर-वधू को को एक दूसरे से अलग कर दिया गया। वे दोनों कहां गए, उनका क्या हुआ, कोई नहीं जानता।

वैलंटाइन को कारागार में डाल दिया। उसे मृत्यु-दण्ड की सज़ा दी गई। उसके जीवन लीला की समाप्ति के लिए
१४ फरवरी सन् 270 ई० का दिन निश्चित कर दिया गया।

एक दिन पहले जूलिया वैलंटाइन से मिली, आंखें रो रो कर सूज गई थीं। इतने दिनों में दोनो के दिलों में पवित्र प्रेम की लहर पैदा हो चुकी थी। उसी लहर ने उसके मनोबल को बनाए रखा। जूलिया के इन आंसुओं में दृष्टि के विकार भी बह गए थे। उसकी आंखें पहले से अधिक देखने के योग्य हो गईं। दोनों एक दूसरे से लिपट गए। वैलंटाइन ने मोमबत्ती की लौ को देख कर कहा,’ जूलिया,शमा की इस लौ को जलाए रखना। मेरा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। एक दिन क्लॉडियस स्वयं अपने ही बनाये हुए कानून के जाल में फंस जाएगा। प्रेम कभी किसी का दास नहीं होता।’

थोड़ी देर के पश्चात जेल के दो सैनिकों ने आकर पादरी को प्रणाम किया और आदर सहित जूलिया को घर पहुंचा दिया।

वह घर में ही रही। उसकी अंतिम घड़ियों को कल्पना के सहारे आंसुओं से धोती रही।

ज़िंदगी की अंतिम रात वैलंटाइन ने कुछ कोरे कागज़ और एक कलम मंगवाए। कागजों में कुछ लिखता और फिर मोमबत्ती की लौ में जला देता। केवल एक कागज़ बचा हुआ था। उस कोरे कागज़ को आंखों से लगाया, फिर दिल के पास दबाए रखा। कलम उठाई, उस में कुछ लिखा और नीचे लिखा - “तुम्हारे वैलंटाइन की ओर से प्रेम सहित।” उसकी आंखों से दो आंसू ढुलक गए जो जमीन पर न गिर कर उस प्रेम-पत्र में समा गए। प्रहरी को बुला कर कहा, ‘ मेरे मरने के बाद यदि इस पत्र को जूलिया तक पहुंचा दो तो मरने के बाद भी मेरी आत्मा आभारी रहेगी।” प्रहरी के नेत्र सजल हो उठे, कहने लगा, ‘पादरी, आप का जीवन बहुत मूल्यवान है। अभी भी मैं कोई उपाय सोचता हूं जिससे आप को कारागार से निकाल कर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जाए। इस शुभ-कार्य में मुझे अपनी जान की परवाह नहीं है।’
वैलंटाइन ने रोक कर कहा, “मेरे इस कार्य में कायरता की मिलावट की बात ना करो। मेरे बाद अनेक वैलंटाइन पैदा होंगे जो प्रेम की लौ जलाए रखेंगे।” प्रहरी ने कागज़ लेकर गीली आंखों को पोंछते हुए दरवाज़ा बंद कर दिया।

अगले दिन नगर-द्वार के पास, जो आज उसकी स्मृति में पोर्टा वैलटीनी नाम से विख्यात है, अनगिनित लोगों की भीड़ थी। जनता के चारों ओर सशस्त्र सैनिक तैनात थे। सैनिक वैलंटाइन को हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ कर मृत्यु-मंच पर ले आए। लोगों के नारों से गगन गूंज रहा था, जमीन आंसुओं से भीग गई थी। उसी समय वैलंटाइन ने ऊंचे स्वर में कहा,
‘ मेरे इस पवित्र अभियान को आंसुओं से दूषित ना करो। मेरी इच्छा है कि प्रेमी और प्रेमिकाएं हर वर्ष इस दिन आंसुओं का नहीं, प्रेम का उपहार दें। शोक, खेद और संताप का लेश-मात्र भी ना हो।” भीड़ में किसी युवक ने भर्राये हुए स्वर में कहा, ‘इस हृदय-विदारक घटना को सुन कर कौन सा पत्थर-दिल इनसान होगा जो शोक, खेद और संताप रहित इस
उत्सव को मना सकेगा।’ साथ ही एक बूढ़े ने युवक के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,’प्रेम की वेदी पर शहीद होने वालों पर मातम नहीं किया जाता, प्रेम की लौ जलाए रखते हुए गौरव और प्रेमोल्लास से उत्सव मना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।’

वैलंटाइन को मंच पर रखे हुए तख्ते पर लिटा दिया गया। चार जल्लाद हाथों में भारी भारी दण्ड लिए हुए थे। पांचवे जल्लाद के हाथ में एक पैनी धार का फरसा था। दण्डाधिकारी ने ऊंचे स्वर में वैलंटाइन से कहा,

‘वैलंटाइन, तुमने रोमन विधान की अवेहलना कर लोगों के विवाह करवा कर सम्राट क्लॉडियस का अपमान किया है। यह एक बहुत बड़ा अपराध है, पाप है जिसके लिए एक ही सज़ा है - निर्मम मृत्यु-दण्ड! तुम यदि अपने अपराध को स्वीकार कर लो तो फरसे से एक ही झटके से तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा और तुम्हारी मौत कष्टरहित होगी। यदि अपना अपराध स्वीकार नहीं करोगे तो इस बेरहमी से मारे जाओगे कि मौत के लिए याचना करोगे पर वो सामने नाच नाच कर तुम्हारे अपराध की याद दिलाती रहेगी।”

वैलंटाइन के मुख पर भय के कोई चिन्ह दिखाई नहीं दे रहे थे। उसने दृढ़तापूर्वक कहा,

‘ मैंने कोई अपराध नहीं किया है। दो प्रेमियों को विवाह-बंधन में जोड़ना मेरा धर्म है, पाप नहीं है।” चारों ओर से एक ही आवाज़ आ रही थी - “वैलंटाइन निर्दोष है।”

दण्डाधिकारी का इशारा देखते ही चारों जल्लादों ने दण्ड को घुमा घुमा कर वैलंटाइन को मारना शुरू कर दिया। दर्शकों की चीखें निकल गई, कुछ तो इस दृश्य को देख कर मूर्छित होगए। जनता के हाहाकार, क्रंदन और चीत्कार के शोर के अतिरिक्त कुछ सुनाई नहीं देता था। एक बार तो जल्लादों के पाषाण जैसे हृदय भी पिघलने लगे। थोड़ी ही देर में सब समाप्त हो गया। वैलंटाइन का निर्जीव शव रक्त से रंगा हुआ था।
वैलंटाइन का शव रोम के एक चर्च में दफना दिया गया जो आज ‘चर्च आव प्राक्सिडिस’ के नाम से प्रसिद्ध है।

जूलिया में इतना साहस न था कि वह इस अमानवीय वीभत्स दृश्य को सहन कर सके। वह घर में ही रही। उसकी अंतिम घड़ियों को कल्पना के सहारे आंसुओं से धोती रही। उसी समय कारागार के प्रहरी ने आकर जूलिया को वैलंटाइन का लिखा पत्र देते हुए कहा, ‘पादरी ने कल रात यह पत्र आपके लिए लिखा था।’
प्रहरी आंखों को पोंछता हुआ चला गया। जूलिया ने पत्र खोला तो वैलंटाइन के अमोल आंसू के चिन्ह ऐसे दिखाई
दे रहे थे जैसे वैलंटाइन की आंखें अलविदा कह रही हों। बार बार पढ़ती रही जब तक आंसुओं से पत्र भीग भीग कर गल गया। पत्र के अंत में लिखा थाः
‘तुम्हारे वैलंटाइन की ओर से प्रेम सहित!’

*** *** *** *** *** *** ***
महावीर शर्मा

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8 Comments »

  1. इस एतिहासिक जानकारी को बाँटने के लिये धन्यवाद

    Comment by राकेश खंडेलवाल — February 18, 2008 @ 12:27 am

  2. बहुत खूबसूरत तरीके से लिखा आलेख। इसे अधिक से अधिक पढ़ा पढ़ाया जाए।

    Comment by दिनेशराय द्विवेदी — February 18, 2008 @ 12:38 am

  3. बहुत उम्दा जानकारी देता संपूर्ण आलेख. आपका आभार.

    Comment by समीर लाल — February 18, 2008 @ 1:27 am

  4. यह पूरी जानकारी नही थी, शुक्रिया!!!!

    Comment by Sanjeet Tripathi — February 18, 2008 @ 7:33 am

  5. महावीर जी
    सादर नमस्कार
    बहुत अच्छा लगा इस वैलनटाइन का विस्तार जो दिल से निकल कर दिल तक एक संदेश दे जाता है.
    सादर

    Comment by Devi Nangrani — February 19, 2008 @ 1:26 pm

  6. बहुत खूबसूरत,बहुत उम्दा आलेख ।

    Comment by ravindra prabhat — February 20, 2008 @ 9:56 am

  7. हमे भी कमेंट लिखा करो

    Comment by Ram Love — March 6, 2008 @ 4:25 pm

  8. बहुत खूबसूरत,बहुत उम्दा आलेख हे, महावीर जी आप को ओर आप के परिवार को होली की बहुत बहुत शुभकमनये

    Comment by राज भाटिया — March 21, 2008 @ 5:07 pm

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