अधूरी हसरतें – ग़ज़ल
कुछ अधूरी हसरतें अश्के-रवाँ में बह गये
क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गये।
गुफ़तगू में फूल झड़ते थे किसी के होंट से
याद उनकी ख़ार बन, दिल में चुभो के रह गये।
जब मिले हम से कभी, इक अजनबी की ही तरह
पर निगाहों से मिरे दिल की कहानी कह गये।
यूं तो तेरा हर लम्हा यादों के नग़मे बन गये
वो ही नग़मे घुट के सोज़ो-साज़ दिल में रह गये।
दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था
शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गये।
दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक़्शे-क़दम ही रह गये।
ख़्वाब में दीदार हो जाता तिरी तस्वीर का
नींद अब आती नहीं, ख़्वाबी-महल भी ढह गये।
महावीर शर्मा








Posted by mehhekk on February 8, 2008 at 3:28 pm
bahut badhiya,khwab mein didar hojata teri tasveer ka,nind ab aati nahi,khwabi mahal bhi deh gaye.sundar.
http://mehhekk.wordpress.com/
Posted by reetesh gupta on February 8, 2008 at 3:54 pm
दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक़्शे-क़दम ही रह गये।
बहुत खूब ..अच्छा लगा महावीर जी…बधाई
Posted by मीत on February 8, 2008 at 4:04 pm
बहुत अच्छा है. ख़ास तौर पे ये शेर तो बस कमाल है :
“जब मिले हम से कभी, इक अजनबी की ही तरह
पर निगाहों से मिरे दिल की कहानी कह गये।”
Posted by reetesh gupta on February 8, 2008 at 4:08 pm
बहुत खूब ..अच्छा लगा महावीर जी…बधाई
दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक़्शे-क़दम ही रह गये।
Posted by reetesh gupta on February 8, 2008 at 4:11 pm
दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक़्शे-क़दम ही रह गये।
बहुत खूब महावीर जी….बधाई
Posted by रवीन्द्र प्रभात on February 8, 2008 at 4:37 pm
व्यस्तता थी , अत: क्षमा करेंगे !आज बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आया , तो आपकी ग़ज़ल पढ़कर मन गदगद हो गया , बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने , बधाईयाँ !
Posted by hemjyo on February 8, 2008 at 6:26 pm
आदरणीय महावीर सर ,
आपकी गज़ल पढ कर बहुत अच्छा लगता है ।
इस गज़ल के शेर भी बहुत अच्छे लगे ।
बस आपकी हर रचना के बाद अगली का इन्त्जार रहता हैं ।
सादर
हेम ज्योत्स्ना “दीप”
Posted by राज भाटिया on February 8, 2008 at 7:25 pm
कुछ अधूरी हसरतें अश्के-रवाँ में बह गये
क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गये।
अरे जनाब बहुत खुब,पहली बार आया तो ठहर सा गया,हर शेर बार बार पढा,हर बार हर शेर मे कही ना कही खुद को ही पाया.
धन्यवाद
Posted by kanchan on February 11, 2008 at 10:32 am
जब मिले हम से कभी, इक अजनबी की ही तरह
पर निगाहों से मिरे दिल की कहानी कह गये।
दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था
शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गये।
दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक़्शे-क़दम ही रह गये।
bhut sundar
Posted by रजनी भार्गव on February 11, 2008 at 9:06 pm
बहुत अच्छी लगी ये गज़ल, खासतौर पर ये पँक्तियाँ,
दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गये, नक़्शे-क़दम ही रह गये।
Posted by neeraj tripathi on March 23, 2008 at 11:51 am
बहुत बढ़िया .. मन खुश हो गया पढ़कर …