महावीर

February 2, 2008

मुश्‍किल भूखों का जीना है !

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 11:14 pm

मुश्‍किल भूखों का जीना है !

मेहनत करके निज हाथों से, बेचारे खेत उगाते हैं,
सारे दिन खून बहा अपना , सूरज ढलने पर आते हैं,
वर्तमान के कष्‍टों को, मुस्‍का मुस्‍का कर सहते हैं,
केवल भावी की आशा में, दो दो दिन भूखे रहते हैं,
पकने पर फ़सल बना सोना, उनका बहुमूल्‍य पसीना है ।
मुश्‍किल भूखों का जीना है !

खलिहानों में निज फ़सल देख वह खड़ा खड़ा मुस्‍काता है,
सूदख़ोर गाड़ी में भर कर, फ़सल साथ ले जाता है,
यूं ही सूरज चला गया, पूनम का चांद निकल आया,
उसे लगा यह चांद नहीं, कोई गोल गोल रोटी लाया ,
एक काले बादल ने आकर, उस रोटी को भी छीना है ।
मुश्‍किल भूखों का जीना है !

पीते हैं कुत्ते दूध कहीं, पर वह भूखा चिल्‍लाता है ,
ऊंचे महलों के नीचे वह, कुटिया में रात बिताता है ,
भूखा रहने के कारण उसकी, आंख नहीं लग पाती है ,
यदि आंख लगे तो सपने में, बिल्‍ली रोटी ले जाती है ,
इस डर से सोता नहीं रात भर, केवल आंसू पीना है ।
मुश्‍किल भूखों का जीना है !!

महावीर शर्मा

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3 Comments »

  1. भूखा रहने के कारण उसकी, आंख नहीं लग पाती है ,
    यदि आंख लगे तो सपने में, बिल्‍ली रोटी ले जाती है

    mun chhuu gayin panktiyaan…..pranaam

    Comment by parulk — February 3, 2008 @ 6:09 am

  2. आदरणीय महावीर जी सर

    बहुत मार्मिक चित्रण किया है यह ।
    किसानो का यही हाल रहा तो …. बहुत लोगो का जीना मुश्किल हो जायेगा ।

    सब को अन्न देने वाले को गर २ वक्त का खाना ना मिल सके तो काहे का विकास ,काहे की प्रगति …

    आपकी अगली रचना के इन्त्जार में
    सादर
    हेम

    Comment by hemjyotsana parashar — February 3, 2008 @ 12:01 pm

  3. खलिहानों में निज फ़सल देख वह खड़ा खड़ा मुस्‍काता है,
    सूदख़ोर गाड़ी में भर कर, फ़सल साथ ले जाता है,

    वर्तमान को बखूबी चित्रित करती है आपकी कविता….बधाई

    Comment by reetesh gupta — February 6, 2008 @ 2:26 pm

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