पर्दा हटाया ही कहां है?-ग़ज़ल
पर्दा हटाया ही कहां है?
ज़िन्दगी में प्यार का वादा निभाया ही कहां है
नाम लेकर प्यार से मुझ को बुलाया ही कहां है?
टूट कर मेरा बिखरना, दर्द की हद से गुज़रना
दिल के आईने में ये मञ्ज़र दिखाया ही कहां है?
शीशा-ए-दिल तोड़ना है तेरे संगे-आसतां पर
तेरे दामन पे लहू दिल का गिराया ही कहां है?
ख़त लिखे थे ख़ून से जो आंसुओं से मिट गये वो
जो लिखा दिल के सफ़े पर, वो मिटाया ही कहां है?
जो बनाई है तिरे काजल से तस्वीरे-मुहब्बत
पर अभी तो प्यार के रंग से सजाया ही कहां है?
देखता है वो मुझे, पर दुश्मनों की ही नज़र से
दुश्मनी में भी मगर दिल से भुलाया ही कहां है?
ग़ैर की बाहें गले में, उफ़ न थी मेरी ज़ुबां पर
संग दिल तू ने अभी तो आज़माया ही कहां है?
जाम टूटेंगे अभी तो, सर कटेंगे सैंकड़ों ही
उसके चेहरे से अभी पर्दा हटाया ही कहां है?
उन के आने की ख़ुशी में दिल की धड़कन थम ना जाये
रुक ज़रा, उनका अभी पैग़ाम आया ही कहां है?







aaderniye mahavir jee sir,
hamesha ki tarnh bahut badiya ghazal padne ko….
comments dene ki yogyta nhi bas… Apni upastithi padewalo main darj kara rahi hun.
saadar,
hemjyotsana
Comment by hemjyotsana parashar — December 17, 2007 @ 8:12 pm
बहुत दिनों बाद आपके ब्लाग में आया हूं आपके भाव व बंद मुझे बहुत भाते हैं । शुक्रिया ।
Comment by Sanjeeva Tiwari — December 17, 2007 @ 11:02 pm
bahut sundar panktiyaan ….bahut bahut aabhaar
Comment by parulk — December 18, 2007 @ 5:12 am
“देखता है वो मुझे, पर दुश्मनों की ही नज़र से
दुश्मनी में भी मगर दिल से भुलाया ही कहां है?
जाम टूटेंगे अभी तो, सर कटेंगे सैंकड़ों ही
उसके चेहरे से अभी पर्दा हटाया ही कहां है?”
आदरनिये महावीर जी
प्रणाम
शब्दों की अपनी सीमायें होती हैं वे दिल के ज़ज्बात को हुबहू बयां नहीं कर पाते. ये ही समस्या मुझे हो रही है आप की ग़ज़ल पढ़ कर. कहाँ से वो शब्द लाऊं जो मेरे मन में उठे भाव आप तक पहुँचा पाएं. बहुत सुंदर शब्द और एक से बेहतर एक भाव वाह…..आप ने भाव विभोर कर दिया अपनी रचना से.
अनुरोध है की मैंने भी आज एक रचना प्रेषित की है समय मिले तो पढ़ कर आशीर्वाद दें.
नीरज
Comment by neeraj — December 18, 2007 @ 5:23 am
बहुत खूबसूरत लिखा है।
Comment by anuradha srivastav — December 18, 2007 @ 5:49 am
उन के आने की ख़ुशी में दिल की धड़कन थम ना जाये
रुक ज़रा, उनका अभी पैग़ाम आया ही कहां है?
भाव और शब्द बहुत सुन्दर सहज रूप से दिल में उतर जाती हैं.
Comment by मीनाक्षी — December 18, 2007 @ 5:55 am
सरजी कई दिनों बाद आया हूँ. और आते ही आपकी इतनी अच्छी गजल पढने को मिली कृतार्थ हो गया.
“देखता है वो मुझे, पर दुश्मनों की ही नज़र से
दुश्मनी में भी मगर दिल से भुलाया ही कहां है?”
बहुत खूब. पढ़ कर अच्छा लगा.
Comment by balkishan — December 18, 2007 @ 6:47 am
बहुत सुन्दर है, विशेषकर ये पँक्तियां,
ख़त लिखे थे ख़ून से जो आंसुओं से मिट गये वो
जो लिखा दिल के सफ़े पर, वो मिटाया ही कहां है?
जो बनाई है तिरे काजल से तस्वीरे-मुहब्बत
पर अभी तो प्यार के रंग से सजाया ही कहां है?
Comment by rajni.bhargava — December 21, 2007 @ 3:21 am
देखता है वो मुझे, पर दुश्मनों की ही नज़र से
दुश्मनी में भी मगर दिल से भुलाया ही कहां है?
बहुत सुंदर ..आपकी पूरी गज़ल पसंद आई…बधाई
Comment by reetesh gupta — December 21, 2007 @ 6:51 pm
khubsurat
Comment by mehek — January 1, 2008 @ 3:28 am
Mahavir ji
aapki is gazal ka paigaam kadam dar kadam saath saath chal raha hai. kisi ka koi padaav na choota hai na chootega. haan bus har mod par kadam zaroor badal jaate hai. andheron ko roshan karne ke liye ye shabd hi kafi hai.
aapki kalam mein kuch tezaab sa asar hai.
bus
sadar
Devi
Comment by Devi Nangrani — February 19, 2008 @ 1:31 pm