प्रेम डगरिया
प्रेम डगरिया ही ऐसी है जहां न लुटने का ग़म होता
नयन सजल हों ढल जाएं पर अश्रुकोष नहीं कम होता।
मदमाती पलकों की छाया, मिल जाती यदि तनिक पथिक को,
तिमिर, शूल से भरा मार्ग भी आलोकित आनन्द-सम होता।
डगर प्रेम की आस प्रणय की उद्वेलित हों भाव हृदय के,
अंतर ज्योति की लौ में जल कर नष्ट निराशा का तम होता।
विछड़ गया क्यों साथ प्रिय का, सिहर उठा पौरुष अंतर का,
जीर्ण वेदना रही सिसकती, प्यार में न कोई बंधन होता।
अकथ कहानी सजल नयन में लिए सोचता पथिक राह में,
दूर क्षितिज के पार कहीं पर, एक अनोखा संगम होता!







महावीर जी, कविता तो शानदार है, लेकिन बीच-बीच में यह क्या आ जा रहा है।
कृपया इसे ठीक कर दीजिए। शुक्रिया
Comment by अनिल रघुराज — September 19, 2007 @ 3:07 am
अकथ कहानी सजल नयन में लिए सोचता पथिक राह में,
दूर क्षितिज के पार कहीं पर, एक अनोखा संगम होता।
सुंदर कविता, परंतु रघुराज जी वाली समस्या यहाँ भी आ रही है।
Comment by kanchan — September 19, 2007 @ 11:07 am
अनिल जी तथा कंचन जी
टिप्पणी और समस्या की ओर ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद।
मैंने इस समस्या को सुधारने की कोशिश तो की है। सम्भव है बीच बीच
में जो अनाप-शनाप आ रहा था, अब नहीं आ रहे होंगे।
महावीर
Comment by महावीर — September 19, 2007 @ 12:44 pm
हर पंक्ति सुंदर है:
विछड़ गया क्यों साथ प्रिय का, सिहर उठा पौरुष अंतर का,
जीर्ण वेदना रही सिसकती, प्यार में न कोई बंधन होता।
-सच!!!
बहुत बधाई इस रचना के लिये.
Comment by समीर लाल — September 19, 2007 @ 4:57 pm
क्षमा करें, आचार्य
मैं कुछ दिनो से बहुत व्यस्त था ।
आज से नियमित रहूंगा ।
आपकी कविता को पढना और उसे दिल में उतारना बहुत अच्छा लगता है ।
Comment by Sanjeeva Tiwari — September 20, 2007 @ 4:40 am
महावीर जी,
बहुत सुंदर लिखा है …हमेशा की तरह ह्रदय को स्पर्श करती है आपकी कविता….यह पंक्तियाँ सबसे अच्छी लगीं…..बधाई
विछड़ गया क्यों साथ प्रिय का, सिहर उठा पौरुष अंतर का,
जीर्ण वेदना रही सिसकती, प्यार में न कोई बंधन होता।
Comment by reetesh gupta — September 20, 2007 @ 12:58 pm
अच्छा लगा लिखते रहिए
अति उत्तम रचना
Comment by दीपक श्रीवास्तव — September 21, 2007 @ 5:15 am
पिता तुल्य ,आदरणीय गुरुजी ,बहुत ही अच्छा लगा आपको पढना ,आपका तो बहुत बड़ा प्रशंशक बन गया हूँ मैं ,आपकी रचना पढ़ कर हृदय के किसी संवेदन शील कोने मे एक हलचल सी मच जाती है .बहुत ही अच्छा लगता है आपको पढना . और हाँ ,आपका हमारे ब्लोग पे आके कमेंट करने के लिए बहुत धन्यवाद ।
—–प्रणाम
Comment by राज यादव — September 22, 2007 @ 6:10 pm
आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
ऎसेही लिखेते रहिये.
क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.
Comment by deepanjali — September 24, 2007 @ 9:37 am
महावीर जी
नमस्कार
मदमाती पलकों की छाया, मिल जाती यदि तनिक पथिक को,
तिमिर, शूल से भरा मार्ग भी आलोकित आनन्द-सम होता।
पडते ही गुरबानी से कि पँक्तिक्ती याह आ गई.
“कोई कहियो रे प्रभू आवन की
आवन की, मन भावन की
गुरू आवन की.”
मन को छूती हुई ुह पावन भाषा से भीगी हर पँक्ति भली लगी.
सादर
देवी
Comment by Devi Nangrani — September 26, 2007 @ 10:47 pm
बहुत सुन्दर व भावपूर्ण रचना है।काफ़ी गंभीर अनुभूति , अत्यंत उत्कृष्ट और प्रशंसनीय भी महावीर जी .
सादर…शुक्रिया…/
Comment by ravindra.prabhat — September 28, 2007 @ 3:11 pm
आदरणीय महावीर जी,
बहुत सुन्दर रचना है।
सादर
hemjyotsana
Comment by hemjyotsana parashar — October 1, 2007 @ 8:35 am
आदरणीय सर
प्रणाम,
इधर काफी व्यस्त चल रहा हूँ अपनी पहली लघु फिल्म को लेकर…
कविता का क्या कहना वह तो हमेशा ही आत्म अनुभूतियों से परे
होता है… ख़लील जिब्रान ने कहा है जो इस कविता को पढ़कर याद
आ रहा है… क्योंकि प्रेम मुकुट पहनाता है तो शूली पर भी चढ़ायेगा
जिसप्रकार वह एक विकास को जन्म देता है उसी प्रकार काट-छांट
भी करता है…।
बेहतरीन रचना है सर…।
Comment by divyabh — October 1, 2007 @ 3:22 pm
परम आदरणीय शर्मा जी,
सुन्दर, अति सुन्दर! बस शब्द मौन हो गए हैं…निम्न पंक्तियों में प्यार का संपूर्ण सार सिमट आया है….ढ़ेरों बधाई स्वीकारें….सादर…
Comment by ramadwivedi — October 1, 2007 @ 4:30 pm
परम आदरणीय शर्मा जी,
सुन्दर, अति सुन्दर! बस शब्द मौन हो गए हैं…निम्न पंक्तियों में प्यार का संपूर्ण सार सिमट आया है….ढ़ेरों बधाई स्वीकारें….सादर…
विछड़ गया क्यों साथ प्रिय का, सिहर उठा पौरुष अंतर का,
जीर्ण वेदना रही सिसकती, प्यार में न कोई बंधन होता।
Comment by ramadwivedi — October 1, 2007 @ 4:32 pm
klisht shabdaavali mein bhaavnaayein itni sahaj hain ki klishtta ka pata hi nahi chalt+a
Comment by CHIRAG JAIN — October 8, 2007 @ 5:39 am
आदरणीय महावीर जी,
अकथ कहानी सजल नयन में लिए सोचता पथिक राह में,
दूर क्षितिज के पार कहीं पर, एक अनोखा संगम होता!
आपकी ये पँक्तियाँ बहुत खूबसूरत हैं, आपके ब्लाग पर आ कर बहुत अच्छा लगा.
Comment by rajni.bhargava — October 9, 2007 @ 11:43 am
अति उत्तम । प्यार में न कोई बंधन होता ! सही कहा है महावीर जी।
Comment by डा0अनिल चड्डा — October 23, 2007 @ 4:10 pm
इक फूल बालों में सजाने, खार से उलझे रहे,
वो हैं कि उनका फूल से भी, जिस्म छिलता जाए है।
आदरणीय महावीर जी …बहुत सुंदर ….बधाई
Comment by reetesh gupta — December 10, 2007 @ 9:59 pm