महावीर

September 18, 2007

प्रेम डगरिया

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 5:30 pm

प्रेम डगरिया ही ऐसी है जहां न लुटने का ग़म होता
नयन सजल हों ढल जाएं पर अश्रुकोष नहीं कम होता।

मदमाती पलकों की छाया, मिल जाती यदि तनिक पथिक को,
तिमिर, शूल से भरा मार्ग भी आलोकित आनन्द-सम होता।

डगर प्रेम की आस प्रणय की उद्वेलित हों भाव हृदय के,
अंतर ज्योति की लौ में जल कर नष्ट निराशा का तम होता।

विछड़ गया क्यों साथ प्रिय का, सिहर उठा पौरुष अंतर का,
जीर्ण वेदना रही सिसकती, प्यार में न कोई बंधन होता।

अकथ कहानी सजल नयन में लिए सोचता पथिक राह में,
दूर क्षितिज के पार कहीं पर, एक अनोखा संगम होता!

महावीर शर्मा

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September 11, 2007

ठहरो अभी बताऊंगा

(सन् 1960 के पन्नों से)

इस दुनिया में आ कर साथी, देखो मैं ने सब कुछ पाया
पर एक चीज़ अब तक ना मिली ठहरो अभी बताऊंगा

जाड़े के ठण्डे मौसम में जब शीत पवन चल जाता है
सच कहता हूं यह बन्दा तो सर्दी में रोज़ नहाता है
एक थाल सजा, दीपक रख कर, लोटे में ले ठण्डा पानी
शिव राम कृष्ण हनुमान रटूं, निकला करती कम्पित वाणी
फिर जा कर प्रतिदिन मन्दिर में बस यही प्रार्थना करता हूं
भगवन सुनो विनती मेरी, मैं बिन मारे ही मरता हूं
सप्ताह में छः दिन व्रत रख के, फल दूध दही मीठा खाया

पर एक चीज़ अब तक ना मिली ठहरो अभी बताऊंगा

डिग्री एम.ए. तक की ले कर बी.टी. की पूंछ लगाई है
अध्यापक बन, ट्यूशन से भी, कर ली बहुत कमाई है
धोती कुर्ते को दे तलाक़ मैं ने पतलून सिलाई है
सिलकन कमीज़ और कोट गरम, पहनी नीली नकटाई है
पैरिस से सैण्ट मंगा कर सब वस्त्रों पर छिड़का करता हूं
मॉडर्न बूट पहन पैरों को धीरे धीरे धरता हूँ
जीवित माँ बाप अभी तक हैं पर मूंछों का भी किया सफ़ाया

पर एक चीज़ अब तक ना मिली ठहरो अभी बताऊंगा

यदि कमरे में जा कर देखो तो, भेद पता चल जायेगा
झाड़ू कोने में सिसक रही, कूड़े का शासन पायेगा
जा के रसोई में देखो सच चूहे दण्ड पेलते हैं
बर्तन आपस में मिल कर के, बस आंख मिचौनी खेलते हैं
रावण धर भेष भिखारी का, लाया था सीता को हर के
मैं किस की सीता हर लाऊं अपना यह मुख काला करके
कहते हैं वो मिले जिसको, व्यर्थ हुई सारी माया
पाठक हैं सब ज्ञानी मानी , अब मैं ही क्या समझाऊंगा

जो एक चीज़ अब तक मिली, अब कैसे जुबाँ पर लाऊंगा

महावीर शर्मा

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