वह मौन था !
रो उठी व्याकुल निशा -
वह मौन था !
सिसकती वेदना
कराह रही उस झोंपड़ी की चेतना में !
था भूख औ बेकारी से यौवन जरा-सम,
अकुला रही थी भूख भी
जड़वत नयन की पुतलियों में !
उस दर्द पर
मक्खियां थी भिनभिनाती
और भिनभिनाहट के सिवा
हर चीज़ वहां खामोश थी ।
क्षुधा - पीड़ित -
मर चुका था !
मिट गई थी हर व्यथा
वह मौन था !!
रो उठी व्याकुल निशा -
वह मौन था !
सिसकती वेदना !
जल रही थी स्वप्न की निशि होलिका में
संजोये आशा की मिटती किरण
चिर विरह कुण्ठित हुई
रोती रही
गाती रही !
खो गया जीवन समूचा
उस गीत की आवाज़ में ,
अतिरिक्त उस आवाज़ के
जो कुछ भी था निःशब्द था
चिर विरही !
मर चुका था,
मिट गई थी हर व्यथा
वह मौन था !!







कविता बहुत अच्छी लगी ।
घुघूती बासूती
Comment by ghughutibasuti — August 20, 2007 @ 7:26 pm
बहुत ही सुन्दर रचना. बधाई.
Comment by समीर लाल — August 20, 2007 @ 10:32 pm
मौन जब टुता
गिरा है शब्द फ़िसला
लड़खड़ाता
इसलिये हर भाव से
अभिव्यक्ति का समन्ध सहसा
टूट जाता
और घायल वेदना फिर कसमसाती
छटपटाती
है असह्य यह
इसलिये भी
जल रही थी मौन की
परछाईयों में घुल गया था
और फिर से मौन था.
Comment by राकेश खंडेलवाल — August 21, 2007 @ 12:01 am
बहुत सुंदर …बधाई
Comment by reetesh gupta — August 21, 2007 @ 12:16 am
सब लोग बधाई दे रहे है. बधाई के लायक है भी इसलिए बधाई हो बधाई.
Comment by बसंत आर्य — August 21, 2007 @ 2:23 am
पढ़ने वाला भी कुछ देर कौ मौन ही हो जाता इतने सजीव शब्द सुनकर
Comment by kanchan chouhan — August 21, 2007 @ 11:09 am
GOOD…………very good.
Comment by virendrasingh — August 21, 2007 @ 1:31 pm
आदरणीय सर,
इतना सजीव चित्रण है यह की वह तो मौन था ही अपनी परिस्थितियों के बश में पर साथ मौन और खामोशी छा गई है कुछ हमारे मन में भी… सहजता से एक विकट और अंधकार में छिपा दृश्य सामने आगया…।
Comment by divyabh — August 21, 2007 @ 3:29 pm
डा. रमा द्विवेदी said…
मौन की यह पराकाष्ठा,
शब्द जब नि:शब्द बन जाएं
दांव अपना ज़िन्दगी जब हार जाती ,
हर व्यथा तब चिर मौन बन जाए।
बहुत सुन्दर और मार्मिक अभिव्यक्ति….
Comment by ramadwivedi — August 21, 2007 @ 4:48 pm
वाह …वाह …
आदरणीय महावीर जी,
आपकी कविता मौन रहकर भी बहुत कुछ कह गई
शब्द सौँदर्य व काव्य की भँगिमा इसे एक सर्वथा अविस्मरणीय काव्य बना रही है -
स्नेह -
– लावण्या
Comment by लावण्या — August 22, 2007 @ 2:55 pm
हर चीज़ वहां खामोश थी ।
क्षुधा - पीड़ित -
मर चुका था !
मिट गई थी हर व्यथा
वास्तविकता के बेहद करीब हैं. बहुत अच्छा लिखा है।
Comment by रवीन्द्र रंजन — August 27, 2007 @ 12:26 pm
महावीर जी
कराह रही उस झोंपड़ी की चेतना में !
था भूख औ बेकारी से यौवन जरा-सम,
अकुला रही थी भूख भी
कुछ कहते नहीं बन रहा है, जो महसूस करती हूं वो जुबाँ मूक रहती है
प्रसव पीड़ा सी अंगडाई
ले रहा हड़ दर्द मेरा
थाह कहीं क्या पाऊँगी मैं
सोच रही हूँ पढ़ते पढ़ते.
सादर
देवी
Comment by Devi Nangrani — October 13, 2007 @ 1:43 pm
आदरणीय महावीर जी सर
आपकी रचना दिल को छू गई और मै मौन रह गई ।
सादर
हेम ज्योत्स्ना
Comment by hemjyotsana parashar — January 26, 2008 @ 2:45 pm