महावीर

August 14, 2007

स्वतन्त्रता-दिवस पर शुभकामनाएं

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 12:53 pm

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रामधारी सिंहदिनकर

ध्वज-वंदना

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नमो, नमो, नमो।

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो !
नमो नगाधिराज - श्रृंग की विहारिणी !
नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!
प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!
नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!
नवीन सूर्य की नयी प्रभा,नमो, नमो!

हम किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार।
प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार।
सत्य न्याय के हेतु
फहर फहर केतु
हम विचरेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!

 

तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग!
दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग।
सेवक सैन्य कठोर
हम चालीस करोड़ *
कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर
करते तव जय गान
वीर हुए बलिदान,
अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!

- रामधारी सिंहदिनकर

प्रेषक- महावीर शर्मा

( * जिस समय यह काविता लिखी गयी थी, उस समय भारत की जन-संख्या चालीस करोड़ थी।)

4 Comments »

  1. स्वतंत्रता दिवस की बधाई व शुभकामनाएं

    Comment by समीर लाल — August 15, 2007 @ 1:53 am

  2. आपको भी शुभकामनाएँ दद्दा।

    Comment by श्रीश शर्मा — August 16, 2007 @ 11:36 am

  3. आदरणीय महावीर जी,
    प्रणाम.
    मैं अस्‍सी के दसक में आपकी रचनायें पढते रहा हूं उस समय आपके शव्‍द मुझे बहुत प्रभवित करते थे, स्‍मृति में भाव तो हैं शव्‍द खो गये हैं, अब आपकी रचनाओं को पुन: यहां पढने की लालसा है ।
    संजीव

    Comment by Sanjeeva Tiwari — August 20, 2007 @ 3:44 am

  4. महावीरजी
    आपकी हर रचना एक अर्थपूर्ण भाव लिए होती है पर मेरा बागी मन कभी इन बंधनों की घुतान से रिहाई व आजादी की तलब कर बैठता है.

    अपनी आज़दिओं को हमने अपने ख्वैशों के जाल में जकड रखा है. इस मुक्ति का समाधान ही हमारी साची आज़ादी होगी.
    सादर
    देवी नागरानी

    Comment by देवी — November 14, 2007 @ 3:10 pm

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