ध्वज-वंदना
नमो, नमो, नमो।
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो !
नमो नगाधिराज – श्रृंग की विहारिणी !
नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!
प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!
नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!
नवीन सूर्य की नयी प्रभा,नमो, नमो!
हम न किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार।
प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार।
सत्य न्याय के हेतु
फहर फहर ओ केतु
हम विचरेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!
तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग!
दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग।
सेवक सैन्य कठोर
हम चालीस करोड़ *
कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर
करते तव जय गान
वीर हुए बलिदान,
अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!
- रामधारी सिंह ’दिनकर‘
प्रेषक- महावीर शर्मा
( * जिस समय यह काविता लिखी गयी थी, उस समय भारत की जन-संख्या चालीस करोड़ थी।)












Posted by समीर लाल on August 15, 2007 at 1:53 am
स्वतंत्रता दिवस की बधाई व शुभकामनाएं
Posted by श्रीश शर्मा on August 16, 2007 at 11:36 am
आपको भी शुभकामनाएँ दद्दा।
Posted by Sanjeeva Tiwari on August 20, 2007 at 3:44 am
आदरणीय महावीर जी,
प्रणाम.
मैं अस्सी के दसक में आपकी रचनायें पढते रहा हूं उस समय आपके शव्द मुझे बहुत प्रभवित करते थे, स्मृति में भाव तो हैं शव्द खो गये हैं, अब आपकी रचनाओं को पुन: यहां पढने की लालसा है ।
संजीव
Posted by देवी on November 14, 2007 at 3:10 pm
महावीरजी
आपकी हर रचना एक अर्थपूर्ण भाव लिए होती है पर मेरा बागी मन कभी इन बंधनों की घुतान से रिहाई व आजादी की तलब कर बैठता है.
अपनी आज़दिओं को हमने अपने ख्वैशों के जाल में जकड रखा है. इस मुक्ति का समाधान ही हमारी साची आज़ादी होगी.
सादर
देवी नागरानी