महावीर

August 8, 2007

“अतीत”

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 8:46 pm

अतीत

याद किसी की गीत बन गई!
कितना अलबेला सा लगता था, मुझे तुम्‍हारा हर सपना,
साकार बनाने से पहले , क्यों फेरा प्रयेसी मुख अपना,
तुम थी कितनी दूर और मैं, नगरी के उस पार खड़ा था,
अरुण कपोलों पर काली सी, दो अलकों का जाल पड़ा था,
अब तुम ही अनचाहे मन से अंतर का संगीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!

उस दिन हंसता चांद और तुम झांक रही छत से मदमाती
आंख मिचौनी सी करती थीं लट संभालती नयन घुमाती
कसे हुए अंगों में झीने पट का बंधन भार हो उठा
और तुम्‍हारी पायल से मुखरित मेरा संसार हो उठा
सचमुच वह चितवन तो मेरे अंतर्तम का मीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!

तुम ने जो कुछ दिया आज वह मेरा पंथ प्रवाह बना है
आज थके नयनों में पिघला आंसू मन की दाह बना है
अब न शलभ की पुलक प्रतीक्षा और न जलने की अभिलाषा
सांसों के बोझिल बंधन में बंधी अधूरी सी परिभाषा
लेकिन यह तारों की तङपन धङकन की चिर प्रीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!

महावीर शर्मा

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6 Comments »

  1. नमस्कार सर,
    बहुत दिनो बाद आपकी रचना पढ़ने को मिली ।
    मैं बहुत छोटी हूँ इसलिये आपकी रचनाओं के बारे मे कुछ कहने कोई अर्थ नहीं । फिर भी हमेशा की तरह अच्छी लगी ।
    आपके मार्ग-दर्शन की सदैव इच्छुक हूँ ।

    Comment by hem jyotsana parashar — August 8, 2007 @ 9:08 pm

  2. डा. रमा द्विवेदी….

    आदरणीय शर्मा जी,

    अतीत की यादें अन्तर का संगीत,अन्तर्तम का मीत , धड़कन की चिर प्रीत,और फिर गीत बन जाना….. प्रेम की पराकाष्ठा हैं…अति सुन्दर…सादर…..

    Comment by ramadwivedi — August 9, 2007 @ 9:50 am

  3. आदरणीय सर प्रणाम,
    काफी दोनों बाद आपकी रचना पुन: नई दिशा को लेकर आई…
    कितनी गहराई है यहाँ जिसके संदर्भ में मेरे जैसा अदना नहीं कुछ कह सकता…
    अतीत के पन्नों पर छपे कुछ अधूरे मोहर को क्या शक्ल दी है सर… कई बार पढ़ा बस पढ़ता ही गया…।
    सुंदर अतिसुंदर्…।

    Comment by divyabh — August 9, 2007 @ 3:35 pm

  4. आजकल आप कहाँ हैं. हमें आशीष देने पधार नहीं रहे. यह रचना बहुत पसंद आई, अति सुन्दर. आशा है सब कुशल मंगल होगा

    सादर
    आपका समीर लाल

    Comment by समीर लाल — August 10, 2007 @ 12:45 am

  5. सुंदर हमेशा की तरह कहने को कुछ नही पर समझने को बहुत कुछ

    Comment by kanchan chouhan — August 21, 2007 @ 11:02 am

  6. महावीर जी
    आज थके नयनों में पिघला आंसू मन की दाह बना है
    अब न शलभ की पुलक प्रतीक्षा और न जलने की अभिलाषा
    सांसों के बोझिल बंधन में बंधी अधूरी सी परिभाषा
    लेकिन यह तारों की तङपन धङकन की चिर प्रीत बन गई।
    याद किसी की गीत बन गई!
    बहुत सुंदर हर रचना एक संदेश लिये!!!
    बहुत खुब पेश किया है दिल की तड़प को!!
    आज बिते हुए कल का अतीत बनकर भी साथ रहता है. कल के काधों पर नित नये
    अंकुर फिर से लटका दिये है हमने अपनी यादों के. एक मेरी गज़ल का सेर इसी ओर इशारा करते हुएः

    बदन के इस हवन में जल रहा है रोज़ मन मेरा
    मगर अरमान आहूति में जलकर भी नहीं जलते.
    सादर
    देवी

    Comment by Devi Nangrani — August 24, 2007 @ 5:42 pm

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