महावीर

August 30, 2007

यदि मेरा अधःपतन……

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 5:33 pm

यदि मेरा अधःपतन तेरे इस जीवन का आधार बने तो,
स्वागत सौ सौ बार पतन का !
यदि जीवन के घोर शमन से, मानव का इतिहास बने तो,
स्वागत सौ सौ बार शमन का !

मैं ने देखे हैं वे मानव, ऊंचे महलों में रहते हैं,
बड़े गर्व से जिन्‍हें सभी, उद्योग-पति ही कहते हैं,
मखमल के फर्शों पर चलते, थकने का जिनको भान नहीं,
दानी और श्रीमान बिना, होता जिनका सम्मान नहीं,
धन की मदिरा में मस्त बने, आता न कभी विचार गमन का ।
स्वागत सौ सौ बार पतन का !

वे मानव भी देखे मैं ने, जो फ़ुट पाथों पर रहते हैं,
नफ़रत से आंखें फेर जिन्हें, सब भिखमंगा ही कहते हैं,
पावों से रिसता रक्त , भूख से आंखों में दम आता है,
बोल निकलता नहीं मगर, “बाबा पैसा” चिल्लाता है,
मरने पर लाश पड़ी नंगी है, नहीं वहां कुछ काम कफ़न का!
स्वागत सौ सौ बार पतन का !!

यदि मेरा अधःपतन तेरे इस जीवन का आधार बने तो
स्वागत सौ सौ बार पतन का !
महावीर शर्मा

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August 20, 2007

वह मौन था !

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 4:31 pm

रो उठी व्याकुल निशा -
वह मौन था !
सिसकती वेदना
कराह रही उस झोंपड़ी की चेतना में !
था भूख औ बेकारी से यौवन जरा-सम,
अकुला रही थी भूख भी
जड़वत नयन की पुतलियों में !
उस दर्द पर
मक्खियां थी भिनभिनाती
और भिनभिनाहट के सिवा
हर चीज़ वहां खामोश थी ।
क्षुधा - पीड़ित -
मर चुका था !
मिट गई थी हर व्यथा
वह मौन था !!

रो उठी व्याकुल निशा -
वह मौन था !
सिसकती वेदना !
जल रही थी स्वप्न की निशि होलिका में
संजोये आशा की मिटती किरण
चिर विरह कुण्‍ठित हुई
रोती रही
गाती रही !
खो गया जीवन समूचा
उस गीत की आवाज़ में ,
अतिरिक्त उस आवाज़ के
जो कुछ भी था निःशब्द था
चिर विरही !
मर चुका था,
मिट गई थी हर व्यथा
वह मौन था !!

- महावीर शर्मा

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August 14, 2007

स्वतन्त्रता-दिवस पर शुभकामनाएं

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 12:53 pm

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रामधारी सिंहदिनकर

ध्वज-वंदना

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नमो, नमो, नमो।

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो !
नमो नगाधिराज - श्रृंग की विहारिणी !
नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!
प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!
नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!
नवीन सूर्य की नयी प्रभा,नमो, नमो!

हम किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार।
प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार।
सत्य न्याय के हेतु
फहर फहर केतु
हम विचरेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!

 

तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग!
दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग।
सेवक सैन्य कठोर
हम चालीस करोड़ *
कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर
करते तव जय गान
वीर हुए बलिदान,
अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!

- रामधारी सिंहदिनकर

प्रेषक- महावीर शर्मा

( * जिस समय यह काविता लिखी गयी थी, उस समय भारत की जन-संख्या चालीस करोड़ थी।)

August 8, 2007

“अतीत”

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 8:46 pm

अतीत

याद किसी की गीत बन गई!
कितना अलबेला सा लगता था, मुझे तुम्‍हारा हर सपना,
साकार बनाने से पहले , क्यों फेरा प्रयेसी मुख अपना,
तुम थी कितनी दूर और मैं, नगरी के उस पार खड़ा था,
अरुण कपोलों पर काली सी, दो अलकों का जाल पड़ा था,
अब तुम ही अनचाहे मन से अंतर का संगीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!

उस दिन हंसता चांद और तुम झांक रही छत से मदमाती
आंख मिचौनी सी करती थीं लट संभालती नयन घुमाती
कसे हुए अंगों में झीने पट का बंधन भार हो उठा
और तुम्‍हारी पायल से मुखरित मेरा संसार हो उठा
सचमुच वह चितवन तो मेरे अंतर्तम का मीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!

तुम ने जो कुछ दिया आज वह मेरा पंथ प्रवाह बना है
आज थके नयनों में पिघला आंसू मन की दाह बना है
अब न शलभ की पुलक प्रतीक्षा और न जलने की अभिलाषा
सांसों के बोझिल बंधन में बंधी अधूरी सी परिभाषा
लेकिन यह तारों की तङपन धङकन की चिर प्रीत बन गई।
याद किसी की गीत बन गई!

महावीर शर्मा

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