महावीर

July 24, 2007

खून से मेंहदी रचाते हैं – ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 2:30 pm

अदा देखो, नक़ाबे-चश्म वो कैसे उठाते हैं,
अभी तो पी नहीं फिर भी क़दम क्यों डगमगाते हैं?

ज़रा अन्दाज़ तो देखो, न है तलवार हाथों में,
हमारा दिल ज़िबह कर, खून से मेंहदी रचाते हैं।

हमें मञ्ज़ूर है गर, गैर से भी प्यार हो जाए,
कमज़कम सीख जाएंगी कि दिल कैसे लगाते हैं।

सुना है आज वो हम से ख़फ़ा हैं, बेरुख़ी भी है,
नज़र से फिर नज़र हर बार क्यों हम से मिलाते हैं?

हमारी क्या ख़ता है, आज जो ऐसी सज़ा दी है,
ज़रा सा होश आता है मगर फिर भी पिलाते हैं।

ज़रा तिर्छी नज़र से आग कुछ ऐसी लगादी है,
बुझे ना ज़िन्दगी भर, रात दिन दिल को जलाते हैं।

वफ़ा के इम्तहाँ में जान ले ली, ये भी ना देखा
किसी की लाश के पहलू में खंजर भूल जाते हैं।

महावीर शर्मा

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12 Comments »

  1. वफ़ा के इम्तहाँ में जान ले ली, ये भी ना देखा
    किसी की लाश के पहलू में खंजर भूल जाते हैं

    तेरे अल्फ़ाज़ की बारीकियों की दाद क्या दीजै
    हज़ारों मज़मुए देखे, न ऐसे शेर पाते हैं

    Comment by राकेश खंडेलवाल — July 24, 2007 @ 3:17 pm

  2. OH MY GOD ITS AMAZING!!!
    आदरणीय महावीर सर,
    क्या कहूं… इस रचना की एक-एक पंक्ति को पढ़कर हृदय भावविभोरीत हो गया… लगा किसी ने ठहरे शूल को हलके से स्पर्श कर उसे फिर से जगा दिया हो…बहुत कुछ कहने की इच्छा तो है सर पर…कह नहीं पा रहा हूँ क्योंकि मन की चारदीवारी में जो अनुभूतियाँ बाट जोहे खड़ी दरवाजा खुलने की और जब पट अचानक से खुलता है तो एक आश्चर्य उभरता है…वह आश्चर्य स्वतंत्रता का नहीं होता वरन आनंद का होता है और यही मैं भी महसूस कर रहा हूँ।

    Comment by divyabh — July 24, 2007 @ 3:38 pm

  3. बहुत सुंदर भाव और विचार लिये है आपकी गज़ल ….बधाई

    Comment by reeteshgupta — July 24, 2007 @ 3:50 pm

  4. हमारी क्या ख़ता है, आज जो ऐसी सज़ा दी है,
    ज़रा सा होश आता है मगर फिर भी पिलाते हैं।

    –एक से एक उमदा शेर, महावीर जी. बहुत बहुत पसंद आये. बधाई.

    Comment by समीर लाल — July 24, 2007 @ 5:44 pm

  5. महावीर जी,बहुत बढिया भाव पूर्ण गजल है।हरिक शेर लाजवाब है।

    ज़रा अन्दाज़ तो देखो, न है तलवार हाथों में,
    हमारा दिल ज़िबह कर, खून से मेंहदी रचाते हैं।

    Comment by paramjitbali — July 24, 2007 @ 6:08 pm

  6. आदरणीय बहुत खूब

    Comment by Sanjeeva Tiwari — July 25, 2007 @ 12:50 am

  7. लाजवाब है शेर ,बहुत सुंदर गज़ल है

    Comment by hemjyotsana parashar — July 25, 2007 @ 7:51 am

  8. Bahut barhiya..Saare sher Lay mein parhta chala gaya …
    Bahut achha likha hai…

    Comment by Neeraj Tripathi — July 25, 2007 @ 10:32 am

  9. हमें मञ्ज़ूर है गर, गैर से भी प्यार हो जाए,
    कमज़कम सीख जाएंगी कि दिल कैसे लगाते हैं।

    सुना है आज वो हम से ख़फ़ा हैं, बेरुख़ी भी है,
    नज़र से फिर नज़र हर बार क्यों हम से मिलाते हैं?

    अब आपकी तारीफ के लिये शब्द लाना मेरे वश की बात तो नही!

    Comment by kanchan chouhan — July 25, 2007 @ 11:34 am

  10. डा. रमा द्विवेदी said..

    आपकी गज़ल के हर शेर लाजवाब है…अन्दाज़े बयां सबसे निराला है। हर पंक्ति मर्मस्पर्शी है…कुछ और लिखने के लिए शब्द मौन हो गए हैं…हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। ये शेर विशेष पसन्द आए…..

    हमें मञ्ज़ूर है गर, गैर से भी प्यार हो जाए,
    कमज़कम सीख जाएंगी कि दिल कैसे लगाते हैं।

    वफ़ा के इम्तहाँ में जान ले ली, ये भी ना देखा
    किसी की लाश के पहलू में खंजर भूल जाते हैं।

    Comment by ramadwivedi — July 25, 2007 @ 2:11 pm

  11. Puri gazal bahut achchi lagi. padhane mein , swabhavik hai mano bhav to aayenge hi , kuchch sufiyana andaz bhi shamil ho gaya hai, isliye gazal padhane ke baad bhautik drasti se man aur atma dono ko thodi si trapti aur atma santushti milati hai. Isi tarah likhate rahiye, ham agli gazal padhane ke liye taiyar baithe hain.

    Khati-kitabat ki rasma ko, sada zari rakhana /
    Bhool jana na hamen, yaad hamari rakhana //

    Shukriya.

    DrDBBajpai

    Comment by prakruti — July 28, 2007 @ 8:31 am

  12. महावीर जी
    इतनी सुंदर दिल की गहराइयों से निकली यह गज़ल नायाब नगीने सी बन पड़ी है. दाद देना मेरा बस नहीं पर यह शेर मेरे भाव प्रकट कर रहा है.

    बफाओं का नया अंदाज़ देखा आज हमने जो
    जो सजदे में झुका सर तो कहाँ अब हम उठाते हैं

    सादर
    देवी नागरानी

    Comment by Devi Nangrani — August 10, 2007 @ 5:37 pm

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