जब मैं चौथी क्लास में था (१९४३), उर्दू की एक ग़ज़ल का यह शेर पढ़ा थाः
दो फूल साथ फूले, किस्मत जुदा जुदा है
नौशे के एक सर पे, इक क़ब्र पर चढ़ा है
यह ग़ज़ल मशहूर गायक स्वः मनोहर बरवे (१९१०-१९७२) ने भी गायी थी।
आगे चल कर मैंने इसी प्रत्यय को लेकर हिंदी में एक कविता लिखी, जो नीचे दे रहा हूं:-
खिले एक डाली पर दो फूल !
आई एक बासंती बाला, पड़ती जल बूंदें अलकों से
विकसित सुमनों की सुवास पा, नयनों से ढकती पलकों से
कुछ खोल नयन फिर हाथ बढ़ा, दो सुमनों से एक तोड़ लिया
डलिया के रखे फूलों में एक और सुमन भी जोड़ लिया
मदिर चाल से चली , पवन से लहरा उठा दुकूल ।
पहुंची गौरी के मंदिर में, श्रद्धा से मस्तक नत करके
माँ को फिर फूल किये अर्पित , अपने को भी विस्मृत कर के
गौरी की पूजा में आकर, वह सुमन भाग्य पर इठलाया
मुस्का कर कहने लगा अहा ! कितना स्वर्णिम अवसर पाया
उस डाली पर मिलता मुझ को, प्रति पग पर एक शूल ।
डाली से नीचे गिरा फूल, अगले दिन जब आंधी आई
मिट्टी पर पड़ कर सूख गया, मुख की मञ्जुलता मुरझाई
वह बाला पुनः वहां आई, नव विकसित सुमन चयन करने
पैरों के नीचे कुचल गया, तो लगा फूल आहें भरने
जिस ने जीवन दिया अंत में, मिली वही फिर धूल ।










बहुत सुन्दर व भावपूर्ण रचना है।बधाई।
डाली से नीचे गिरा फूल, अगले दिन जब आंधी आई
मिट्टी पर पड़ कर सूख गया, मुख की मञ्जुलता मुरझाई
वह बाला पुनः वहां आई, नव विकसित सुमन चयन करने
पैरों के नीचे कुचल गया, तो लगा फूल आहें भरने
जिस ने जीवन दिया अंत में, मिली वही फिर धूल ।
डाली से नीचे गिरा फूल, अगले दिन जब आंधी आई
मिट्टी पर पड़ कर सूख गया, मुख की मञ्जुलता मुरझाई
–बहुत सुन्दर रचना, महावीर जी. बधाई.
“वह बाला पुनः वहां आई, नव विकसित सुमन चयन करने
पैरों के नीचे कुचल गया, तो लगा फूल आहें भरने
जिस ने जीवन दिया अंत में, मिली वही फिर धूल ।”
आदरणीय सर,
वैसे तो कविता की सारी पंक्तियाँ अपने-आप में वेहतरीन होती हैं मैंने इसे इसकारण चुना कि यह पूरी कविता का मुल है अंतिम में व्यक्त हुआ…बहुत ही दार्शनिक कविता है या कहें काव्य…जिसे आपने 4 क्लास में पढ़ा और उस दो पंक्तियों से यह गढ़ा गया…वाह!!!!
maananIYa Mahavir jI, ham log aapake rachanaoM par TippaNI nahI kar sakate sirf paDh kar aanand le sakate he. Bahut achChaa laga aaj aapke blog pe pehlI baar aake…
भाष्कर जी की प्रारंभिक पंक्तियों से सहमत होते हुए मै सिर्फ इतना ही कह पा रही हूँ कि काव्यात्मक सौंदर्य के साथ दार्शनिक कविता को पढ़ हमेशा की तरह मन अभिभूत हो गया।
डा. रमा द्विवेदी
‘जीवन और मृत्यु’ का दर्शन बहुत गहरी बात आपने इस कविता में अभिव्यक्त की है…बहुत बहुत बधाई…ये पंक्तियां बहुत अच्छी लगी
पैरों के नीचे कुचल गया, तो लगा फूल आहें भरने
जिस ने जीवन दिया अंत में, मिली वही फिर धूल ।
…सादर
bahut barhiya ..man khush ho gaya parhkar..
sharma ji
aapki kavita dil ko chhoo gayi
realy bahut achha laga
aapki kavita padhkar