महावीर

June 18, 2007

गीत तो गाए बहुत!

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 10:36 am

गीत तो गाए बहुत जाने अजाने
स्वर तुम्हारे पास पहुंचे या ना पहुंचे कौन जाने!

उड़ गए कुछ बोल जो मेरे हवा में
स्यात् उनकी कुछ भनक तुम को लगी हो,
स्वप्न की निशि होलिका में रंग घोले
स्यात् तेरी नींद की चूनर रंगी हो,

भेज दी मैं ने तुम्हें लिख ज्योति पाती,
सांझ बाती के समय दीपक जलाने के बहाने।

यह शरद का चांद सपना देखता है
आज किस बिछड़ी हुई मुमताज़ का यों,
गुम्बदों में गूंजती प्रतिध्वनि उड़ाती
आज हर आवाज़ का उपहास यह क्यों?

संगमरमर पर चरण ये चांदनी के
बुन रहे किस रूप की सम्मोहिनी के आज ताने।

छू गुलाबी रात का शीतल सुखद तन
आज मौसम ने सभी आदत बदल दी,
ओस कण से दूब की गीली बरौनी,
छोड़ कर अब रिमझिमें किस ओर चल दीं,

किस सुलगती प्राण धरती पर नयन के,
यह सजलतम मेघ बरबस बन गए हैं अब विराने।

प्रात की किरणें कमल के लोचनों में
और शशि धुंधला रहा जलते दिये में,
रात का जादू गिरा जाता इसी से
एक अनजानी कसक जगती हिये में,

टूटते टकरा सपन के गृह-उपगृह,
जब कि आकर्षण हुए हैं सौर-मण्डल के पुराने।

स्वर तुम्हारे पास पहुंचे या न पहुंचे कौन जाने!

महावीर शर्मा

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10 Comments »

  1. महावीर जी
    आपकी रचना को पढ कर आभारी हूँ हिन्दी ब्लॉग जगत का जिसने आपसे परिचित कराया। शब्द, शिल्प, भाव…बेहद प्रभावित हुआ महावीर जी आपसे।

    *** राजीव रंजन प्रसाद

    Comment by राजीव रंजन प्रसाद — June 18, 2007 @ 11:18 am

  2. भेज दी मैं ने तुम्हें लिख ज्योति पाती,
    सांझ बाती के समय दीपक जलाने के बहाने।

    बहुत खूबसूरत रचना है महावीर जी. पढ़ते पढ़ते अपने आप ही शब्द स्वर की उंगली पकड़ कर होठों पर मचलने लगते हैं. दो पंक्तियां आप को समर्पित- आप्की लेखनी की प्रेरणा से

    गीत तो मेरे अधर पर रोज ही मचले सुनयने
    पर तुम्हारे स्पर्श के बिन हैं सभी अब तक अधूरे

    Comment by राकेश खंडेलवाल — June 18, 2007 @ 12:52 pm

  3. “गुलाबी रात का शीतल सुखद तन
    आज मौसम ने सभी आदत बदल दी,
    ओस कण से दूब की गीली बरौनी,
    छोड़ कर अब रिमझिमें किस ओर चल दीं”

    आप तो बहुत ही अच्छा लिखते हैं!

    Comment by मैथिली — June 18, 2007 @ 2:55 pm

  4. डा. रमा द्विवेदी said…

    बहुत ही मर्मस्पर्शी गीत गहरी संवेदना के साथ दिल को छू गया….ये पंक्तियां बहुत अच्छी लगीं…..हार्दिक बधाई…

    टूटते टकरा सपन के गृह-उपगृह,
    जब कि आकर्षण हुए हैं सौर-मण्डल के पुराने।

    Comment by ramadwivedi — June 18, 2007 @ 4:02 pm

  5. आदरणीय सर,
    खुबसूरत!!! इतना की मन खुद से ही प्रश्न करने लगता है कि क्या लिखा जाए…एक रूमानीयत है इसकी तासीर में ही कही जो बांध लेती है पकड़ कर दूर से ही… और जो मन का विश्वास दिखा है यहाँ वह तो कविता के प्राण है…जो न होने की आशा में भी रस से अभिसिंचित है अपने में पूर्णता को ले…।

    Comment by divyabh — June 18, 2007 @ 4:52 pm

  6. बहुत ही सुंदर और हृदय में उतरता गीत, लय में पढ़ते चले गये!!

    स्वर तुम्हारे पास पहुंचे या न पहुंचे कौन जाने!

    -बहुत बहुत बधाई..

    Comment by समीर लाल — June 18, 2007 @ 5:36 pm

  7. मै तो तरस गई थी महावीर जी ऐसी कविताओं को पाने के लिये आज के दौर मे जब हर तुकांत अतुकांत पंक्तियों को कविता का नाम दे दिया जाता है, वहाँ भावों की इतनी गहराई, शब्दों का ऐसक बुनाव……अहा..! मैं अपने मुग्ध मन की दशा शबदों मे नही बयाँ कर सकती…..! भगवती चरण शर्मा एवं बच्चन जी का मिलाजुला एहसास मिला !….हमें पढ़ाने के लिये धन्यवाद…!

    Comment by kanchan chouhan — June 19, 2007 @ 5:53 am

  8. महावीर जी बहुत ही प्रभावशाली रचना है आप की.
    भावो, शब्दों और फ़िर दोनों को पिरोने का काम आप की लेखनी ने बखूबी निभाया है…

    Comment by mohinder — June 19, 2007 @ 10:55 am

  9. भेज दी मैं ने तुम्हें लिख ज्योति पाती,
    सांझ बाती के समय दीपक जलाने के बहाने।…….

    टूटते टकरा सपन के गृह-उपगृह,
    जब कि आकर्षण हुए हैं सौर-मण्डल के पुराने।

    स्वर तुम्हारे पास पहुंचे या न पहुंचे कौन जाने!

    bhut aanad mila aapki rachna se….

    dhanywad in behtreen rachnao ke liye

    Comment by hemjyotsana parashar — June 19, 2007 @ 12:47 pm

  10. The imagination surpasses the height of all thoughts that could be compressed in words.

    the speech is speechless at this point.

    Marvellous Reproduction!!!

    Devi Nangrani

    Comment by Devi Nangrani — December 26, 2007 @ 3:44 am

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