महावीर

June 25, 2007

शीत लहर - कहानी

Filed under: कहानी, महावीर शर्मा — महावीर @ 10:56 pm

दिल्ली में एक पुल के नीचे पटड़ियों पर एक ओर ११ और दूसरी ओर १० व्यक्ति जीवन- यातना भुगत रहे हैं। शयनागार, रसोई, कारोबारालय, चौपाल - सभी कुछ इसी में समाये हुए हैं। ना दरवाज़े हैं, ना खिड़की हैं, ताले का तो प्रश्न ही नहीं होता।

इन में कुछ पुरुष और कुछ स्त्रियां हैं और एक स्त्री की गोद में एक बच्चा भी है। इन लोगों की जाति क्या है? ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रीय,शूद्र या दलित वर्ग में तो यह लोग आ नहीं सकते। जाति-वर्गित लोगों को तो लड़ाई झगड़ा करने का, ऊंच और नीच दिखाने का, आरक्षण का, फूट डलवा कर देश में दंगा फ़साद करवाने का और फिर अवैध युक्तियों से अपने बैंक बैलेंस को फुलाने का, अनेक सामाजिक, असामाजिक, वैध या अवैध अधिकार हैं। इन २१ व्यक्तियों को तो ऐसा एक भी अधिकार नहीं है तो इनकी जाति कैसे हो सकती है!

तो फिर ये लोग कौन हैं? इनके नाम हैं - भिखारी, कोढ़ी, लंगड़ा, अंधा, भूखा-नंगा, अपंग, भुखमरा, कंगला, और गरीब होने के कारण इनके तीन नाम और भी हैं क्योंकि कहते हैं,
“गरीबी तेरे तीन नाम; लुच्चा, गुंडा, बेईमान!!”

हां, वह जो बीच में बैठी हुई जवान सी औरत है, उसका नाम है ‘झबिया’। उसकी गोद में जो नन्हा सा बालक है, उसे ये लोग ‘ललुआ’ कह कर पुकारते हैं। पिता का नाम ना ही पूछा जाए तो उचित होगा क्योंकि कभी कभी कुछ विषम स्थिति में असली नाम बताना किसी गोपनीय मृत्यु-दण्ड जैसे अंजाम तक भी पहुंचा सकता है।
झबिया की क्या मजाल है कि कह सके कि उसकी गोद में इस हड्डियों के ढांचे पर पतली सी खाल का आवरण लिए हुए नन्हे से बच्चे का पिता नगर के प्रतिष्ठित नेता का जवान सुपुत्र है।
*** *** *** ***

उस दिन अमावस्या की रात थी जब वह अपनी चमचमाती कार खड़ी करके बाहर निकला था तो झबिया ने केवल इतना ही कहा था,
“साब, भूकी हूं, कुछ पैसे दे दो। भगवान आपका भला करें!”
शराब का हलका सा नशा, अंधी जवानी का जोश और नेतागीरी के आगे गिड़गिड़ाता हुआ कानून -बस उसने झबिया को घसीट कर कार में खींच लिया। झबिया ने तो केवल भूखे पेट भरने को दो रोटी के लिए कुछ पैसे मांगे थे, ना कि यह मांगा था कि अपने उदर में उसका बच्चा लेकर उसको भी भूख से मरता देखती रहे!
*** *** *** ***

गर्मियों की चिलचिलाती हुई धूप, बरसात की तूफानी बौछारें और कंपकंपा देने वाली सर्दियां इन पुलों के नीचे रहने वाले बिन वोटों के नागरिकों के जीवन को अगले मौसम को सौंप कर चल देती हैं।
इस बार तो ठण्ड ने कई वर्षों का रिकार्ड तोड़ डाला। ये कंपकंपाते हुए अभागे बिजली के खम्बों की
रोशनी पर टकटकी लगाए हुए हैं। शायद इतनी दूर से बिजली के बल्ब से ही कुछ गर्मी उन तक पहुंच जाए!

हिमालय की पर्वत-शृंखलाओं से शिशिर ऋतु की डसने वाली बर्फीली शीत लहर गगनचुम्बी अट्टालिकाओं से टक्कर खाती हुई हार मानकर खिसियाई बिल्ली की तरह इन जीवित लाशों पर टूट पड़ी। इन निरीह निःस्सहाय अभागों ने बचाव के लिए कुछ यत्न करने का प्रयास किया जैसे कंपकंपी, चिथड़े, कोई फटी पुरानी गुदड़ी या फिर एक दूसरे से सटकर बैठ जाना। इससे अधिक वे कर भी क्या सकते थे? सभी के दांत ठण्ड से कटकटा रहे थे जैसे सर्दी ध्वनि का रूप लेकर अपने प्रकोप की घोषणा कर रही हो। कुछ शोहदे बिगड़ैल छोकरे राह चलते हुए छींटाकशी से अपना ओछापन दिखाने से नहीं मानते-
“ऐसा लगता है जैसे मृदंग या पखावज पर कोई ताल चगुन पर बज रही है।” इन ठिठुरे हुए बेचारों के कानों के पर्दे सर्दी के कारण जम चुके हैं, कुछ सुन नहीं पाते कि ये छोकरे क्या कुछ कहकर हंसते हुए चले गए। यदि सुन भी लेते तो क्या करते? बस अपने भाग्य को कोस कर मन मसोस कर रह जाते!

झबिया की गोद में ललुआ ठिठुर कर अकड़ सा गया है, ना ठीक तरह से रो पाता है, ना ही ज्यादा हिल-डुल पाता है। माँ उसे सर्दी से बचाने के लिए अपने वक्ष का कवच देकर जोर से चिपका लेती है। ललुआ माँ के दूध-रहित स्तनों को काटे जारहा है। बड़ी बड़ी बिल्डिंगों से हार कर बड़े आवेग से एक बार फिर यह बर्फानी हवा का झोंका इन पराजित निहत्थों पर भीषण प्रहार कर अपनी खीज उतार रहा है।

एक गाड़ी इस हवा के झोंके की तीव्र गति को पछाड़ती हुई सड़क पर पड़े हुए बर्फीली पानी पर से
सरसराती हुई चली जाती है। कार के पहियों से उछलती हुई छुरी की तरह बर्फीली पानी की बौछारों से इन
लोगों के दातों की कटकटाहट भयंकर नाद का रूप लेलेती हैं। ललुआ ने अकस्मात ही झबिया के वक्ष को
काटना, चूसना बंद कर दिया, आंखें खुली पड़ी हैं, माँ की ओर टिकी हुई हैं जैसे पूछ रहा हो,
“माँ, मुझे क्यों पैदा किया था?”

झबिया उसे हिलाती-डुलाती है किंतु ललुआ के शरीर में कोई हरकत नहीं है। वह दहाड़ कर चीख़ उठती है। सभी की आंखें उसकी ओर घूम जाती हैं, बोलना चाहते हैं पर बोलने की शक्ति तो शीत-लहर ने छीन ली है!!

महावीर शर्मा

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June 18, 2007

गीत तो गाए बहुत!

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 10:36 am

गीत तो गाए बहुत जाने अजाने
स्वर तुम्हारे पास पहुंचे या ना पहुंचे कौन जाने!

उड़ गए कुछ बोल जो मेरे हवा में
स्यात् उनकी कुछ भनक तुम को लगी हो,
स्वप्न की निशि होलिका में रंग घोले
स्यात् तेरी नींद की चूनर रंगी हो,

भेज दी मैं ने तुम्हें लिख ज्योति पाती,
सांझ बाती के समय दीपक जलाने के बहाने।

यह शरद का चांद सपना देखता है
आज किस बिछड़ी हुई मुमताज़ का यों,
गुम्बदों में गूंजती प्रतिध्वनि उड़ाती
आज हर आवाज़ का उपहास यह क्यों?

संगमरमर पर चरण ये चांदनी के
बुन रहे किस रूप की सम्मोहिनी के आज ताने।

छू गुलाबी रात का शीतल सुखद तन
आज मौसम ने सभी आदत बदल दी,
ओस कण से दूब की गीली बरौनी,
छोड़ कर अब रिमझिमें किस ओर चल दीं,

किस सुलगती प्राण धरती पर नयन के,
यह सजलतम मेघ बरबस बन गए हैं अब विराने।

प्रात की किरणें कमल के लोचनों में
और शशि धुंधला रहा जलते दिये में,
रात का जादू गिरा जाता इसी से
एक अनजानी कसक जगती हिये में,

टूटते टकरा सपन के गृह-उपगृह,
जब कि आकर्षण हुए हैं सौर-मण्डल के पुराने।

स्वर तुम्हारे पास पहुंचे या न पहुंचे कौन जाने!

महावीर शर्मा

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June 8, 2007

नयनों से भीगे से जलकण!

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 5:52 pm

कवि हृदय विकल जब होता है तो भाव उमड़ ही आते हैं
नयनों से भीगे से जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।

आते बसंत को जब देखा, हो विकसित कवि का मन बोला
आई उपवन में हरियाली, सुमनों ने दृग अंचल खोला
मुस्का कर देखा ऊपर को, जहां अंशुमालि थे घूम रहे
अपनी आल्हादित किरणों से, सुमनों के मुख को चूम रहे

मधुमास में उनकी किरणों से पल्लव शृंगार बनाते हैं।
नयनों से भीगे से जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।

हो कर ओझल क्षण भर में ही, स्वप्नों का खण्डन कर डाला
क्षण भर को ही क्यों आई थी? बोलो मधु बासंती बाला
अब नयनों में ले भाव सजल, अधरों पर ले कंपित वाणी
क्या हुआ तुम्हारे यौवन को, पतझड़ में बोलो कल्याणी!

कवि की वीणा के सुप्त तार, बस वीत राग अब गाते हैं।
नयनों से भीगे से जलकण कविता बन कर बह जाते हैं।

महावीर शर्मा

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June 4, 2007

‘लिख चुके प्यार के गीत बहुत’

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 10:19 am

मेरी एक पुरानी कविता है:

लिख चुके प्यार के गीत बहुत कवि अब धरती के गान लिखो।
लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।

तू तो सृष्टा है रे पगले कीचङ में कमल उगाता है,
भूखी नंगी भावना मनुज की भाषा में भर जाता है ।
तेरी हुंकारों से टूटे शत्‌ शत्‌ गगनांचल के तारे,
छिः तुम्हें दासता भाई है चांदी के जूते से हारे।

छोड़ो रम्भा का नृत्य सखे, अब शंकर का विषपान लिखो।।

उभरे वक्षस्थल मदिर नयन, लिख चुके पगों की मधुर चाल,
कदली जांघें चुभते कटाक्ष, अधरों की आभा लाल लाल।
अब धंसी आँख उभरी हड्‍डी, गा दो शिशु की भूखी वाणी ,
माता के सूखे वक्ष, नग्न भगिनी की काया कल्याणी ।

बस बहुत पायलें झनक चुकीं, साथी भैरव आह्‍वान लिखो।।

मत भूल तेरी इस वाणी में, भावी की घिरती आशा है,
जलधर, झर झर बरसा अमृत युग युग से मानव प्यासा है।
कर दे इंगित भर दे साहस, हिल उठे रुद्र का सिहांसन ,
भेद-भाव हो नष्ट-भ्रष्ट, हो सम्यक्‌ समता का शासन।

लिख चुके जाति-हित व्यक्ति-स्वार्थ , कवि आज निधन का मान लिखो।।

महावीर शर्मा

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