पीनी पड़ गई - ग़ज़ल
कभी कभी इनसान कुछ ऐसे हालात का शिकार हो जाता है कि ना
चाहते हुए भी पीने पर मजबूर हो जाता है। इस ग़ज़ल में ऐसे ही
७ शरीफ़ आदमियों की मजबूरियां देखिए जिसकी वजह से
‘पीनी पड़ गई‘।
हाँ, आप भी ज़रूर बताईयेगा कि आप को कौन सी मजबूरी थी
जिसकी वजह से इस दिलकश मनहूस ‘पीनी पड़ गई‘ के आगोश
में सब भूल गए थे।
१. हम कहां पीते, मगर इक बार पीनी पड़ गई
मिल गए कुछ ब्लॉगियाई यार, पीनी पड़ गई।
२. हम ने तो कर ली थी तौबा, सिर्फ़ पी कर एक बार
इश्क़ में जब हो गए बीमार, पीनी पड़ गई।
३. डाल कर बाहें गले में हंस के बोले साकिया
दिल न तोड़ो, पी भी लो सरकार! पीनी पड़ गई।
४. मुस्कुरा, नीची नज़र से होंट पर ख़म ला के बोलीं
मत सताओ, मय में मेरा प्यार, पीनी पड़ गई।
५. चश्म के पैमाने थे या जाम दो लबरेज़ थे
देख कर, ना कर सके इनकार, पीनी पड़ गई।
६. देख शोख़े-मैकदा को हम तो बिस्मिल हो गए
लुट गए हम, जब किया इज़हार, पीनी पड़ गई।
७. नाम मेरा प्यार से अपनी हथेली पर लिखा
हाथ छू कर वस्ल का इक़रार, पीनी पड़ गई।
महावीर शर्मा







गज़ल आपकी पढ़कर, यूँ नशे में डूबे यार
होश न आ जाये इस बार, पीनी पड़ गई।
—वाह वाह, बहुत बेहतरीन, महावीर जी. आज तो यही कह कर पीनी पड़ेगी, बाकि कल का कल बहाना खोजेंगे.
मजा आया.
Comment by समीर लाल — May 23, 2007 @ 11:01 pm
महावीर भाई, हमें तो बिना पिये ही आपकी गज़ल पढ़कर नशा तारी होने लगा है
Comment by धुरविरोधी — May 23, 2007 @ 11:50 pm
इस गज़ल का जो नशा चढ़ने लगा तो दिल मेरा
कह उठा इसका करो उपचार, पीनी पड़ गई
Comment by राकेश खंडेलवाल — May 24, 2007 @ 12:57 am
बहुत अच्छे ..
Comment by काकेश् — May 24, 2007 @ 1:44 am
बहुत खूब!हमें भी टिप्पणी लिखनी पड़ गयी!
Comment by अनूप शुक्ल — May 24, 2007 @ 11:58 am
मुफ़्त की जव तके मिले भईया पीले
फ़िर न कहना जेव सीनी पड गयी
Comment by mohinder — May 24, 2007 @ 12:49 pm
प्रणाम सर,
क्या खुब अंदाज-ए-बयां है आपकी नये द्स्तुर पर भी वही रोशनी बस नत्मस्तक हूँ!!!हर शब्द की अपनी व्याख्या है और आपना संस्मरण…पढ़कर बस बहुत अच्छा लगा!!!
Comment by divyabh — May 25, 2007 @ 5:39 pm
Yarr ne dhoke se chodha,Gazal aap-ki se naata jodha
bas isee chakkar mein yaar, Hamain bhee peene padh gai
Comment by Shekhar — July 17, 2007 @ 7:30 pm
maikkade ki ronke shamo shehar ko kya hua……….
shek ne jo chod di humein peeni pad gayi
Comment by vikas dwivedi — August 6, 2007 @ 2:27 pm