महावीर

May 23, 2007

पीनी पड़ गई - ग़ज़ल

Filed under: उर्दू शायरी, महावीर शर्मा — महावीर @ 7:22 pm

कभी कभी इनसान कुछ ऐसे हालात का शिकार हो जाता है कि ना
चाहते हुए भी पीने पर मजबूर हो जाता है। इस ग़ज़ल में ऐसे ही
शरीफ़ आदमियों की मजबूरियां देखिए जिसकी वजह से
पीनी पड़ गई
हाँ, आप भी ज़रूर बताईयेगा कि आप को कौन सी मजबूरी थी
जिसकी
वजह से इस दिलकश मनहूसपीनी पड़ गईके आगोश
में
सब भूल गए थे।

१. हम कहां पीते, मगर इक बार पीनी पड़ गई

मिल गए कुछ ब्लॉगियाई यार, पीनी पड़ गई।

२. हम ने तो कर ली थी तौबा, सिर्फ़ पी कर एक बार

इश्क़ में जब हो गए बीमार, पीनी पड़ गई।

३. डाल कर बाहें गले में हंस के बोले साकिया

दिल तोड़ो, पी भी लो सरकार! पीनी पड़ गई।

४. मुस्कुरा, नीची नज़र से होंट पर ख़म ला के बोलीं

मत सताओ, मय में मेरा प्यार, पीनी पड़ गई।

५. चश्म के पैमाने थे या जाम दो लबरेज़ थे

देख कर, ना कर सके इनकार, पीनी पड़ गई।

६. देख शोख़े-मैकदा को हम तो बिस्मिल हो गए

लुट गए हम, जब किया इज़हार, पीनी पड़ गई।

७. नाम मेरा प्यार से अपनी हथेली पर लिखा

हाथ छू कर वस्ल का इक़रार, पीनी पड़ गई।

महावीर शर्मा

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