महावीर

May 2, 2007

एक बेटी का अभागा पिता

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एक बेटी का अभागा पिता
लेखकः महावीर शर्मा
साभारः “कादम्बिनी” मार्च 2006

लन्दन
15 जुलाई, 2005

मेरी प्यारी बेटी
मेरे इस पत्र की तिथि देख कर तुम सोचती होगी कि इससे दो दिन पहले ही तो फ़ोन पर बात हुई थी,फिर यह पत्र क्यों?… बेटी, इस पत्र में जो कुछ लिख रहा हूं, वह फोन पर सम्भव नहीं था। इस पत्र की प्रेरणा मुझे दो बातों से मिली। सुबह सड़क पर गिरे कुछ काग़ज़ मिले जिन में किसी पिता के मर्म-स्पर्शी उद्‌गार भरे हुए थे। ऐसा लगा जैसे कि उसकी आत्मा उन्हीं काग़ज़ों के पुलिंदे के इर्द-गिर्द भटक रही हो। दूसरे, स्वर्गीय पं. नरेन्द्र शर्मा की पंक्तियों को पढ़ कर ह्रदय विह्वल हो उठा।

तुम जिस प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थीं, उसी के पास वुडसाइड पार्क ट्यूब स्टेशन के साथ वुडसाइड एवेन्यू पर प्रायः घूमने जाता हूं जहां दोनो ओर सुन्दर वृक्षों की शृंखला है और रास्ते में वही स्कूल तुम्हारे बचपन की यादें ताज़ा करता रहता है। उसी समय पर एक पुलिस ऑफिसर भी प्रतिदिन गश्त पर मिल जाता है। बड़ा मिलनसार और स्वभाव से हंस-मुख है। वह मजाकिया भी है। आज रोज़ की तरह सुबह सैर के लिये उसी वुडसाइड एवेन्यू पर जा रहा था कि काग़ज़ों के एक पुलिंदे पर पाँव की हल्की-सी ठोकर लगी। मैं वहीं रुक गया। अपनी छड़ी से उसे हिलाया और झुक कर उठा लिया। देख ही रहा था कि इस में क्या है, वही पुलिस ऑफिसर भी पास आ गयाः‘ हैलो सीनियर! क्या कोई खज़ाना मिल गया है?” वह मुस्कुरा कर बोला।

पैन्शनर (सीनियर सिटीज़न) होने के नाते वह मुझे मज़ाक में सीनियर ही कह कर सम्बोधित करता था। मैं ने भी परिहास की भाषा में उत्तर दियाः ‘ आप ही देख कर बताओ कि कहीं किसी आतंकवादी का रखा हुआ बम तो नहीं है?’ पुलिंदे को देख कर हंसते हुए कहने लगाः ‘ लोग wildes-letter-1.jpgइतने सुस्त और लापरवाह हो गये हैं कि रद्दी के काग़ज़ बराबर में रखे हुए डस्ट बिन (कूड़े-दान) तक में भी नहीं डाल सकते ! लाओ, मैं ही डाल देता हूं।” मैं उन काग़ज़ों को अपने हाथों में उलट-पलट ही रहा था कि देखा पत्रों के साथ एक विवाह प्रमाण-पत्र भी था। मैं ने उसका ध्यान इस की ओर आकर्षित किया। कुछ क्षणों के लिये तो वह स्तब्ध रह गया। उसके चेहरे पर आर्द्रता का भाव झलक उठा, “ये किसी की धरोहर है। मैं इसे पुलिस-स्टेशन में जमा करवा दूंगा।” मेरी उत्सुकता और भी बढ़ गई। मैंने उन पत्रों को देखने की इच्छा प्रकट की तो उसने कहा कि यह बंडल क्योंकि तुम्हें ही मिले हैं, तुम पुलिस-स्टेशन जा कर देख सकते हो और यदि छः मास तक किसी ने भी इसके स्वामित्व का दावा नहीं किया तो हो सकता है कि यह तुम्हारी ही संपत्ति मानी जाए।

उत्सुकतावश मैं दोपहर के समय पुलिस-स्टेशन चला गया। संयोगवश स्वागत-कक्ष में वही ऑफिसर ड्यूटी पर था। औपचारिक कार्यवाही के पश्चात मैं एक एकांत कोने में बैठ कर पढ़ता रहा। बेटी! ये मुड़े-तुड़े पुराने साधारण से दिखनेवाले काग़ज़ एक हृदय-स्पर्शी पत्रों का एक संग्रह था जिस में कुछ पत्र प्रथम विश्वयुद्ध में युद्धस्थल से किसी सैनिक ‘राइफलमैन जॉर्ज वाइल्ड‘ ने अपनी इकलौती प्यारी बेटी ‘ऐथल ’ के नाम लिखे थे। कैसी विडंबना है! उसके उद्‌गार, उसके अरमान, उसकी सिसकती वेदना- आज भग्न-स्वप्न की तरह सड़क के किनारे इन काग़ज़ों में सिसक रहे थे! पत्र, पेंसिल से पीले काग़ज़ों पर लिखे हुए थे। इन पत्रों में आतताइयों का वर्णन था। वह अभागा सैनिक ऐसे स्थान पर था, जिसे ‘नो मैन्सलैण्ड’ कहा जाता था, जहां केवल चूहे थे। औषधियों का अभाव था, बीमारियों का बाहुल्य था और वे वनस्पतियां थीं जो फुंसी-फोड़े, अंधौरी और ददौरी आदि के अतिरिक्त कुछ नहीं देती थीं।
वह अपनी बेटी को सांत्वना देते हुए लिखता है- ‘ मेरी बेटी! तुम भाग्यशाली हो। उन व्यक्तियों की ओर दृष्टि डाल कर देखो जिनके पिता, भाई, पति, पुत्र-पुत्री… युद्ध की वीभत्स-घृणित-भूख को मिटा ना सके। इसीलिये ही कहता हूं कि तुम कितनी भाग्यवान हो कि अभी भी तुम्हारा पिता इन पत्रों को लिखने के लिये जीवित है।’
बेटी ऐथल को अपने अंतिम पत्र में लिखता है- ‘मैं हर समय घर लौटने का स्वप्न देखता रहता हूं कि तुम और शारलौट (उनकी पत्नी) दरवाज़े पर मेरी बाट निहारते होंगे और मैं गले लगा कर, रो-रो कर अपने दमित उद्‌गार और उन यातना भरे क्षणों को खुशियों के आँसुओं के सैलाब में बहा दूं! किन्तु ईश्वर ही जानता है कि भविष्य में तुम से मिलने की यह आकांक्षा पूरी हो सकेगी या नहीं। मैं सदैव आशान्वित जीवन में जीता हूं।’

किंतु दुर्भाग्य और आशा के युद्ध में दुर्भाग्य ही जीत गया। 19 नवम्बर 1917 के दिन शत्रु के एक लड़ाकू-वायुयान के आक्रमण में घायल होने के कारण फ्रांस में न. 63, ‘केज़ुअलटी क्लीयरिंग स्टेशन’ में भर्ती हो गया। डॉक्टर और सर्जन उसे बचा न सके। 10 दिन के बाद अपनी प्यारी बेटी और प्रिया शारलॉट से मिलने की अधूरी अभिलाषा अपने साथ ले कर इस वैषम्य भरे संसार से 39 वर्ष की आयु में सदैव के लिये विदा ले ली!

उनकी पत्नी को युद्ध कार्यालय की ओर से एक औपचारिक सूचना मिली कि तुम्हारे पति जो लन्दन रेजिमेण्ट की 9वीँ बटालियन में सैनिक था, के शव को बेल्जियम में ‘हैरिंगे मिलिट्री कब्रिस्तान‘ में अंतिम संस्कार सहित दफ़ना दया गया।

इन पत्रों के साथ एक अखबार की कतरन भी थी जिसमें पश्चिमी रण-स्थल का नक्शा था। साथ ही था जॉर्ज वाइल्ड तथा शारलॉट एलिज़ाबेथ हॉकिन्स के विवाह का प्रमाण-पत्र जिसके अनुसार उन दोनो का विवाह 8 जुलाई 1900 में लन्दन के चेल्सी क्षेत्र में सेंट सिमंस चर्च में समपन्न हुआ था।

आज इन अमूल्य लेख्य-पत्रों को ठोकरों में स्थान मिला। पुलिस ने साल्वेशन आर्मी और अन्य संस्थाओं से संपर्क किया है किंतु इन दु:ख भरे दस्तावेज़ों के उत्तराधिकारी की खोज में अभी सफलता नहीं मिली।
(बेटी, कभी कभी न जाने क्यों मेरे मन में नकारात्मक विचार आ जाते हैं कि क्या मेरे पत्रों का भी यही हाल होगा ?)
प्यार भरे आशीर्वाद सहित
तुम्हारे डैडी

यह पत्र मिलते ही मेरी बेटी ने फौरन् ही टेलीफोन किया और कहा, ‘डैडी, जिस प्रकार आपने लंदन के वातावरण में भी मुझे इस योग्य बना दिया कि आपके हिंदी में लिखे पत्र पढ़ सकती हूं और समझ भी सकती हूं, उसी प्रकार मैं आपके नाती को हिंदी भाषा सिखा रही हूं ताकि बड़ा हो कर वह भी अपने नाना जी के पत्र पढ़ सके। आपके सारे पत्र मेरे लिये अमूल्य निधि हैं। मेरी वसीयत के अनुसार आपके पत्रों का संग्रह उत्तराधिकारी को वैयक्तिक संपत्ति के रूप में मिलेगा!’

सुन कर मेरे आंसुओं का वेग रुक ना पाया! मेरी पत्नी ने टेलीफोन का चोंगा हाथ से ले लिया…!

महावीर शर्मा

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