नारद जी सोच रहे थे कि मृत्यु-लोक (पृथ्वी) में जाकर एक गिटार ले लिया जाए। युगयुगांतरों के समय की सीढ़ियां चढ़ चढ़ कर नारद जी के शरीर में अब पहले सी ऊर्जा नहीं रही थी। वीणा का भार और आकार दोनों ही वादन में कभी कभी आड़े आजते थे।
इसी गुनताड़े में नेत्र मुंदे हुए थे कि अचानक से एक दैवी अलौकिक ज्योति के तेज से आंखें खुल कर चुंधिया गईं। देखा तो साक्षात सृष्टि-पालक चतुर्भुजधारी विष्णु भगवान दैन्यावस्था में हाथ जोड़े खड़े हुए थे। नारद जी ने घबड़ा कर प्रभू को आसन पर बिठाया। स्तुति करने लगे,”आपका यश तीनों लोकों में …..” विष्णु जी ने बीच में ही रोक कर कहा, ” नारद, इस लंबी चौड़ी स्तुति में समय व्यर्थ मत करो। वह फिर कभी हो जाएगी। मैं तुम्हारी मंत्रणा और सहायता लेने के लिए आया हूं।”
नारद जी ने खड़ताल बजाते हुए कहा,” प्रभो, आप निष्कंटक हो अपनी समस्या बताएं और आज्ञा दें”
भगवान अपने कमल-लोचनों के भीतर अमृत समान अश्रु-कण को संभालते हुए बोले, “नारद, युग बीत गया है, मानव ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है कि मेरी नींद हराम हो गई है। कहीं कोई ऐसा स्थान मिल जाए जहां छुप कर थोड़ा विश्राम कर सकूं। जहां भी जाता हूं मानव मुझे ढूंढ ही लेता है। इसी कारण स्वास्थ्य गिरता जा रहा है, शरीर और मस्तिष्क में सामंजस्य नहीं हो पा रहा है। सोने के लिए मंदिर-मंदिर भटकता हूं कि कहीं शयन कर सकूं। किंतु धन-लोलुप पुजारियों ने दिन रात छः छः बार आरतियों के समय निर्धारित कर दिए हैं और शेष काल में कीर्तन की धम-धम जिससे भक्त-गण बार बार आकर धन-विसर्जन द्वारा परलोक सुधारें।”
“मेरी निद्रा का नाटक होता है लेकिन सोने नहीं देते। बड़े बड़े सेठ महंगे से महंगे नए नए स्वादिष्ट चाकलेट, मिठाइयां, फल आदि मेरे मुंह में ठूंसे रहते हैं। तुम देख रहे हो मेरा जो छरैरा लावण्य-युक्त शरीर था चर्बी का लोथड़ा बनता जा रहा है। तौंद ऐसी बढ़ गई है जैसे उदर में से कोई नया प्लैनिट निकलने वाला है।”
“अब डर लग रहा है कि मैं प्रकृति को कैसे संभाल पाऊंगा। मानव-जाति ने तो मेरी सृष्टि को रसातल में पहुंचाने की ठान ली है। न्यूक्लियर विस्फोटक धमाकों से मेरी सुंदर और कोमल प्रकृति डर के मारे अपनी फबन ही भूल गई। इसी कारण ग्लोबल वार्मिंग से प्रकृति उथल-पुथल हो रही है। वनस्पति, पेड़, पौदे, फूल आदि अनायास ही ऋतु-परिवर्तन के कारण असमंजस में पड़ गए हैं। नाना प्रकार के रोगों को आश्रय मिल गया है।”
“लक्षमीं जी की इतनी मांग है कि उनसे भेंट किए हुए युग होने लगा है। अर्थ-शास्त्र के नियम ‘डिमांड एंड सप्लाई’ का प्रश्न है, उन्हें क्या दोष दें?”
चंद्रमा, बृहस्पति, मंगल आदि नक्षत्रों में शांति ढूंढने गया तो वहां भी मानव अपने अंतरिक्ष-यान भेज कर मानवीय प्रदूषण फैलाने में रत हैं।”
नारद जी सांत्वना देते हुए बोले,”हे महाबाहो, आप चिंतित मत हो, मैं निर्विलंब मृत्यु-लोक जाकर जांच-पड़ताल कर, शीघ्र लौट कर कोई उपाय करता हूं।।”
नारद जी ने अपने पाइलट को मेघ-दूत नामक विमान को तैयार करने का आदेश दिया। आकाश-मार्ग से पृथ्वी की ओर रवाना हो गए। विमान से विहंगम-दृष्टि डाली और कहने लगे, “पाइलट, नीचे देखो – इंद्र देव ने इंद्र के अखाड़े की एक शाखा पृथ्वी पर भी खोल दी है। अनेक अप्सराएं तीन-चौथाई नग्न-शरीर द्वारा अपनी नृत्य-कला का प्रदर्शन कर रहीं हैं। पाइलट ने जो नीचे देखा तो विमान डोलने लगा। किंतु संभल कर कहा, “मुनिवर, यह इंद्र का अखाड़ा नहीं है। यह मुम्बई नगर का प्रख्यात बॉलीवुड है।” नारद जी ने विमान वहीं पास में लैंड कर, विमान को दैवी-कला से अदृश्य-रूप देकर, अकेले ही एक फिल्म स्टूडियो में जा फंसे। किसी धार्मिक फिल्म की शूटिंग हो रही थी। बड़ा सुंदर सैट बना हुआ था। क्षीर सागर में शेष-शैया पर विष्णु जी लेटे हुए थे और लक्षमी जी उनके चरण दबा रही थीं। नारद जी आश्चर्य-वश कुछ क्रोधित से हुए कि विष्णु जी ने मुझ से ऐसा छल क्यों किया। यहां आराम से निद्रा का आनंद ले रहे हैं। अभी सोच ही रहे थे कि डाइरेक्टर ने असिस्टेंट
को झाड़ पिलाई, ” नारद कहां मर गया? जभी देखा दूर पर नारद जी खड़े हुए थे, उन पर बरस पड़ा, “अबे अब खड़ा खड़ा क्या देख रहा है, अपनी लाइन बोल ना!” नारद जी सकपका गए- कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह व्यक्ति क्या कह रहा है। इतने में ही जूनियर आर्टिस्ट (extra)जो पास ही था, बीड़ी का एक लम्बा कश खींच कर जल्दी से आ पहुंचा। नारद के मेक अप में वीणा के तार झंकारते हुए स्तुति की लाइनें बोलनी आरंभ की। डाइरेक्टर ने झल्ला कर नारद जी की ओर इशारा देकर कहा,
“इस मरदूद को बाहर निकालो। मूड बिगाड़े दे रहा है।”
नारद जी ने साहस कर, जोर से कहा,”अपने हृदय में झांक कर तक नहीं देखते, दया तो लगता है आप लोगों के शब्द-कोश में ही नहीं है।” किसी ने धक्का मारते हुए कहा, “यहां दिल में झांकने का किस को वक्त है। देख नहीं रहा कि जरा सी गलती से लाखों पर पानी फिर जाएगा।”
बेचारे बाहर निकले तो पुलिस ने घेर लिया जिन्हें शक हुआ कि कोई आतंकवादी तोनहीं है, “हाथ ऊपर उठालो, वर्ना एक ही गोली से सिर में से भेजा बाहर आजाएगा।” पुलिस बिना सोचे ही समझे इस निष्कर्ष पर पहुंच गए कि वीणा के तंबूरे में बम है।
बस बम-सुंघनी कुतिया बुलाई गई। कुतिया ने सूंघ कर नारद जी की धोती, वीणा और सारे शरीर का एक्स-रे कर डाला। वीणा तोड़ फोड़ डाली।चारों तरफ हल्ला मच गया। लोग जोर जोर से चीखते हुए भाग कर कह रहे थे ,”भागो, भागो। बम फट गया।”
मिंटों में बाजार बंद हो गया। पुलिस चीफ ने हंसते हुए कहा, “अरे भई, यह तो बहरूपिया है। लोगों का दिल बहलाता है।” नारद जी को थोड़ी सी वार्निंग दे कर छोड़ दिया। नारद जी कहने लगे,
“तुम्हारे हृदय में तो जरा भी दया नहीं है। वहां धक्के मार मार कर निकाल दिया और यहां मेरी वीणा भी नष्ट-भ्रष्ट कर डाली।” वही उत्तर मिला, “अबे बहरूपिये, दिल विल की बात मत कर, किसके पास वक्त है? तू शुक्र कर कि तुझे बिना रिश्वत के ही छोड़ रहे हैं। यह तंबूरा कहीं और जा कर बजा।”
नारद जी घबरा गए। तुरंत ही पाइलट को आदेश दिया और उड़े ही थे कि चारों ओर हल्ला मच गया कि ‘एलियन आगए हैं’। पाइलट ने दैवी ऐक्सलेटर दबाया तो विमान हवा से बातें करने लगा। नीचे चारों ओर लोगों की भीड़, मीडिया के कैमरों की फ्लैश से आकाश में ऐसा लग रहा था जैसे किसी मिनिस्टर के बेटे के विवाह पर आतिशबाज़ी हो रही हो। अगले सवेरे ही अखबारों में मुख्य पृष्ठ पर खबर छपी थी “एलियंस इन मुंबई”। सुर्खियों की खबर से सारे अखबार मिन्टों में बिक गए।
झुटपुटा सा हो गया था, थके हारे हुए, भूखे प्यासे पिटे से नारद जी ने एक पार्क देख कर मेघ-विमान वहीं ठहरा लिया। पाइलट वहीं विमान में बैठा रहा । नारद जी एक बैंच पर बैठ गए। उसी बैंच पर एक नशैड़िया हाथ में बोतल लिए बहक रहा था। नारद जी को जो देखा तो दोनों हाथेलियों के बीच बोतल पकड़ कर जमीन पर साष्टांग लेट कर विनयपूर्वक लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, “नारदाए नमो नमो! मुनि जी परसाद रूप जमना पार जगतपुर की यह गंगा घाट की जिन जो प्योर देसी है, स्वीकार करके इस दास को किरतारथ करें। नारद जी, एक दिन भोले नाथ के एक भक्त ने अंगरेजी शैंपेन पला दी तो पता लगा कि यह अंग्रेज लोग हम भारतियों को कितना धोका देते हैं। जरा भी नशा नहीं हुआ। आप ही बताओ कि हमारी गौरमेंट जान बूझ कर गलती करते हैं या नहीं? अगर गंगा घाट की देसी जिन यूरोप में एक्सपोर्ट कर दें तो तो वहां के लोग स्कॉच, व्हिस्की, शैंपेन वगैरह वगैरह को छुएंगे भी नहीं।
नारद जी ने इस पर ध्यान ना देते हुए पूछा, “बंधु, यहां समीप ही कहीं कोई मंदिर है?” नशैड़िए भाई फट से बोले, “दुनिया की सब से बड़े परजा तंतर देश में भला मंदिर ना हो , कैसे हो सकता है? बिड़ला मंदिर, शिवाला, गौरी मंदिर, काली मंदिर, हनुमान मंदिर…….जामा मस्जिद, मोती मस्जिद……. गुरद्वारा……” सूची बढ़ती जा रही थी।
नारद जी चुपचाप उठ कर चल दिए। पास के ही मंदिर में पहुंचे तो भक्तों की लंबी कतार, भिखारियों की भीड़। दो लड़के, थे तो भिखारी, किंतु एक के हाथ में माउथ-आर्गन था और दूसरा सिर से चुनरी
लहराते हुए गाना गा रहा थाः
‘चोली के पीछे क्या है।’
नारद जी ने एक भिखारी से पूछा, ‘भई, यह किस देवता का मंदिर है?’ भिखारी ने नारदजी की जेब का दृष्टि-भोग करके देखा कि यह तो कोई फोकटिया है। धक्का देते हुए कहा,’ अबे हट! धंधे का वक्त है, बात मत कर….’ जोर जोर से पेट पर हाथ मार मार कर चिल्लारहा था, “दस रुपए का सवाल है, सड़क के उस पार चारों बच्चे भूक से तड़प तड़प कर दम तोड़ रहे हैं। आप को भगवान दस करोड़ देगा……”
नारद जी लाइन में खड़े हो गए। अंत में अंदर जाने का अवसर मिल ही गया। लाउडस्पीकर के शोर में यह ही पता नहीं लग रहा था कि पुजारी जी श्लोक बोल रहे थे या किसी को फटकार रहे थे।
अब आरती का समय हो गया। पुजारी जी आरती की बोली लगा रहे थे,
“आज सभी भक्तों को स्वर्ण अवसर दिया जा रहा है। आज इस विशेष दिवस पर इस समय जो भक्त अर्द्ध नारीश्वर की आरती उतारेगा, उसके पिछले और वर्तमान के सारे पाप धुल जाएंगे। इतना ही नहीं, भविष्य में जो भी पाप करेंगे, वे भी इस आरती की ज्योत में जल जायेंगे जिससे आप धनातिरेक से वंचित ना रहें। तो भक्तों बढ़ बढ़ के बोली लगाओ।
आरती की नीलामी १००१ रुपए से आरंभ होकर ११००१ रुपए पर रुकी। आरती की थाली नीलामी विजेता सेठ छदम लाल के हाथों में थमा दी गई। सेठ जी ने आरती के लिए जो मुंह खोला तो बत्तीसी में सामने के दो दांत नदारद और दांतों के झरोके से हवा निकलने के कारण गा रहे थेः-
‘ओम जै जगदीफ हरे फ्वामी जै जगदीफ हरे!!’
आरती के बाद थाली में नोटों की बौछार! नारद जी का दम सा घुट रहा था। अर्द्ध नरीश्वर की मूर्ती के साथ ही विष्णु भगवान की मूर्ती पर नारद जी को दया आ रही थी। भक्तों की कुछ भीड़ कम हुई तो साहस जुटा कर प्रसाद मांगा। पहले तो पुजारी ने अपनी आंखों की ऐनक हटा कर नारद जी ऊपर से नीचे का एक्स-रे कर डाला, “बंधु लगता है तुम इस इलाके में नए आए हो। तुम्हारा नाम क्या है?” नारद जी ने अपनी वीणा से गंधार स्वर को झंकारते हुए कहा,”नारद!” पुजारी ने अपने शिष्य से धीरे से कहा, “लगता है पागलखाने से भाग आया है। परसों के बासी बचे हुए प्रसाद में से दो तीन दाने दे कर इसे ‘बिहारी’ कर।”
हर जगह यही देखा कि हृदय का कोई मूल्य नहीं है। हृदय में किसी के भी पास झांकने तक का समय नहीं है।एक बार तो रैड-लाईट के इलाके में फंस गए थे, पीछा छुड़ाना मुश्किल हो गया था।
विमान में बैठ कर सोच रहे थे कि यदि विष्णु जी का यही हाल रहा तो विश्व का क्या होगा। फिर सोचा कि विष्णु जी व्याकुल हो रहे होंगे, विमान की गति को तीव्र कर शीघ्र ही विष्णु-लोक पहुंच गए। देखते ही भगवान ने नारद के पैर पकड़ लिए।” नारद, आपने कोई उपाय ढूंढा है क्या?” नारद जी मुस्कराए और वीणा के टूटे हुए तारों से ही कुछ प्रेम-भरे स्वरों को झंकारते हुए बोले, “हाँ, महाबाहो। मेरी मृत्यु-लोक यात्रा व्यर्थ नहीं थी। मैंने वह स्थान ढूंढ लिया है जहां आप निष्कण्टक हो विश्राम करेंगे और देखने के लिए कोई फटकेगा तक नहीं।”
भगवान की बांछें खिल गईं। खुशी में नींद भी उड़ गई। लालायित हो पूछने लगे,
“कहां है वह स्थान? शीघ्र कहिए!”
नारद जी वीणा की ट्यूनिंग करते हुए बोले, “हे त्रिलोकीनाथ! संसार में इंसान को धन-लोलुपता के कारण अपने हृदय में झांकने तक का समय नहीं है। आप निःसंकोच मनुष्य के हृदय में विराजिए। मंदिरों में घंटे घड़ियाल बजते रहेंगे, मूर्तियों को खिलाते रहेंगे, धन लुटाते रहेंगे किंतु कोई नहीं देखेगा कि प्रभू दिल के मंदिर में वास करते हैं।“










Posted by अभय तिवारी on April 25, 2007 at 12:01 am
भई वाह आप तो खूब लिखते हैं.. ..और आप तो पुराने खिलाड़ी भी हैं.. मैंने ही आपको पहली बार पढ़ा..माफ़ करें..पुनः.. बढि़या है..
Posted by सागर on April 25, 2007 at 1:26 pm
हमेशा कि भाँति बहुत सुन्दर लेख,
पर यह देख कर दुख हुआ कि एक नारद की पीड़ा पर सबक परेशान हैं और इन नारदजी की पीड़ा पर किसी ने मरहम नहीं लगाया। खैर समय समय कि बात है वही बिकता है जिसे अपना माल बेचना आता है:)
Posted by ramadwivedi on April 25, 2007 at 4:17 pm
डा. रमा द्विवेदी ………….
आदरणीय शर्मा जी,
आपका लेख पढ़ा बहुत ही सुरुचिपूर्ण ,रोचक,गंभीर और साथ ही साथ शिक्षाप्रद भी है…सच है मनुष्य के पास दया,क्षमा,सहानुभूति नाम की चीज़ नहीं रह गई है…व्यस्तताओं के भेंट सब कुछ चढ़ गया है…भगवान को भी लोग अब सोने नहीं देते….हास्य का रंग लिए यह लेख गंभीर समस्या की ओर संकेत करता है….सुन्दर अति सुन्दर……ढ़ेरों बधाई स्वीकारें…..सादर…
डा. रमा द्विवेदी
Posted by समीर लाल on April 25, 2007 at 6:44 pm
महावीर जी
अभी विस्तार से सभी पंक्तियों को आनन्द लेते हुए पढ़ा. बहुत ही अच्छा लिखा है. सच कहा है आपने ‘कोई नहीं देखेगा कि प्रभू दिल के मंदिर में वास करते हैं।“ .
घोर दिखावे और आडंबरों में फंसा इंसान अपने खुद के दिल में तक नहीं झांक रहा- बहुत बधाई इस सुंदर आलेख के लिये.
Posted by divyabh on April 26, 2007 at 7:38 pm
सर चरणस्पर्श,
बहुत दिनों बाद लौटा हूँ…थोड़ा नये काम के कार्ण ज्यादा व्यस्त हूँ…।
बहुत गहरा व्यंग किया है मानवीय क्रियाकलापों पर जो नितांत सत्य हैं
और जिसमें हम झांकना नहीं चाहते…।भीतर का ईश्वर सच में दूर चला
गया है और हम निश्चित ही आज अकेले है तभी तो इतने मैले हैं…।
Posted by श्रीश शर्मा 'ई-पंडित' on April 26, 2007 at 9:08 pm
वाह वाह कमाल का लेख लिखा है। पठनीय और सहेजने योग्य।
ब्लॉगजगत के नारदमुनि की दशा भी इस लेख वाले नारद जी की तरह ही हो रही है आजकल।
Posted by महावीर on April 29, 2007 at 2:27 pm
अभय
पहली बार ही सही, पढ़ी तो है। बहुत धन्यवाद!!
Posted by महावीर on April 29, 2007 at 2:28 pm
सागर
इन नारद जी का भी आप जैसे भक्तों द्वारा कल्याण होगा। समय की बात है।
(हम ने आपका अदनान सामी पर लेख पढ़ा? चुप चाप अपने ब्लाग पर पूरा का
पूरा लेख चुरा कर एक ही शब्द तरकश में बंद
कर बिना शीर्षक के प्रकाशित कर दिया।
कोई आपत्ति?
Posted by महावीर on April 29, 2007 at 2:28 pm
दिव्याभ
काफी दिनों के बाद अब पर फिर से Divine India में भावनाओं के
रंग भरने लगे हैं। बड़ा अच्छा लग रहा है।
टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
Posted by महावीर on April 29, 2007 at 2:29 pm
रमा जी
आपका इस जालघर में आगमन ही सौभाग्य की बात है। बहुत बहुत धन्यवाद!
Posted by महावीर on April 29, 2007 at 2:29 pm
समीर
आलेख पसंद आया, मुझे इससे बढ़ कर क्या खुशी होगी। धन्यवाद!
Posted by महावीर on April 29, 2007 at 2:34 pm
श्रीश
लेख पढ़ने के लिए बहुत धन्यवाद। भई, ब्लॉगी नारद जी का भी सब कुछ ठीक हो ही
जाएगा। कहते हैं कि कूड़ी के भी १२ साल में भाग्य जाग जाते हैं। तो यह नारद जी तो
ब्लॉगियों के चहीते हैं। इस में इतना समय नहीं लगेगा।
Posted by kakesh on May 2, 2007 at 9:27 am
आज मैं भी आपको पहली बार ही पढ़ रहा हूं . कई दिनों पहले एक नाटक किया जो एक नेता के ऊपर केन्द्रित था उसमें भी एक पात्र था नारद . ऎसा ही कुछ वर्णन था कुछ नारद का उसमे . बहुत मजा आया था. आज इसे पढ़कर वो याद फिर ताजा हो गयी.
Posted by हरिराम on May 25, 2007 at 11:47 am
विष्णु जी शायद अब राहु-केतु को सिखा-पढ़ा कर भेजेंगे, सूरज को सिर्फ एक दिन के लिए नहीं, कई दिनों के लिए निगले रहो, ग्लोबल वार्मिंग तभी कम होगी न!