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बुढ़ापा!

March 14, 2007

बुढ़ापा!
जवाँ जब वक़्त की दहलीज़ पर आंसू बहाता है,
बुढ़ापा ज़िंदगी को थाम कर जीना सिखाता है।
पुराने ख़्वाब को फिर से नई इक ज़िंदगी देकर,
अधूरे से पलों को फिर कहानी में सजाता है।
तजुर्बे उम्र भर के चेहरे की झुर्रियां बन कर,
किताबे-ज़िंदगी में इक नया अंदाज़ लाता है।
किसी के चश्म पुर-नम दामने-शब में अंधेरा हो,
बुझे दिल [...]