हर इक हाथ में पत्थर क्यूं है

सुदर्शनफ़ाकिर” की एक ग़ज़ल

आज के दौर में दोस्त ये मंज़र क्यूं है
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूं है

जब हक़ीक़त है कि हर ज़र्रे में तू रहता है
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूं है

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूं है

ज़िंदगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अबफ़ाकिर”
वर्ना हर आंख में अश्कों का समंदर क्यूं है
सुदर्शनफ़ाकिर”

Leave a Comment