हर इक हाथ में पत्थर क्यूं है
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सुदर्शन “फ़ाकिर” की एक ग़ज़ल आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूं है जब हक़ीक़त है कि हर ज़र्रे में तू रहता है अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी ज़िंदगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब “फ़ाकिर” |
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सुदर्शन “फ़ाकिर” की एक ग़ज़ल आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूं है जब हक़ीक़त है कि हर ज़र्रे में तू रहता है अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी ज़िंदगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब “फ़ाकिर” |