महावीर

March 16, 2006

कौन ये? दीपा जोशी

Filed under: कविता — महावीर @ 6:00 pm
कौन ये ?
कौन बन प्रणय नाद
विरह वेदना को तोड़ता
है कौन जो श्वासों की डोर
तोड़कर फिर जोड़ता।
कौन बन अश्रु
तृषित लोचनों में डोलता
है कौन जो लघु प्रणों में
बन रुधिर दौड़ता 

कौन बन संगीत
मधु मिलन गीत बोलता
है कौन जो पिघल श्वासों में
मन के भेद खोलता 
कौन बन दीप
चिर तिमिर को घोलता
है कौन जो निस्पंद उर को
फिर जीवन की ओर मोड़ता….

दीपा जोशी 

March 7, 2006

हर इक हाथ में पत्थर क्यूं है

Filed under: उर्दू शायरी — महावीर @ 6:42 pm

सुदर्शनफ़ाकिर” की एक ग़ज़ल

आज के दौर में दोस्त ये मंज़र क्यूं है
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूं है

जब हक़ीक़त है कि हर ज़र्रे में तू रहता है
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूं है

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूं है

ज़िंदगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अबफ़ाकिर”
वर्ना हर आंख में अश्कों का समंदर क्यूं है
सुदर्शनफ़ाकिर”

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