महावीर

November 17, 2005

हिमालय की गोद में

Filed under: महावीर शर्मा, लेख — महावीर @ 12:31 am

हिमालय की गोद में!

हिमालय की गोद में ऊंची ऊंची पर्वत-शृंखलाओं से आच्छादित, अपनी प्राकृतिक विरासत को सहेजे हुए, नयनाभिराम दृश्यों की नैसर्गिक छटा से अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम, नेपाल के खुम्बू क्षेत्र में ४०० लोगों की जनसंख्या का ऊंचाई पर एक छोटा सा खेती-प्रधान गांव है ‘ फोर्त्से ‘।
टॉनी फ्रीक, न्यू बार्नेट, इंगलैंड के ६८ वर्षीय रिटायर्ड को सौंदर्य मन को अभिभूत कर देने वाले इस छोटे से गांव ने पहली ही भेंट में ऐसा1.Tony Freake.JPG मोह-पाश में जकड़ा कि सेवा-निवृत्ति के पश्चात १७ वर्षों में २५ बार वहां जाकर प्रकृति-दर्शन की पिपासा बुझाता रहा।
टॉनी सेवा-निवृत्ति से पहले किंग्ज़ कालेज, लन्दन में हैड आव फ़िज़िक्स लैबॉरट्रीज़ के पद पर कार्य-रत था।
इन रमणीय दृश्यावलियों और शहरों से अछूते निःस्वार्थ ग्रामीणों की सादगी और प्यार के अतिरिक्त देखने को ज्यादा कुछ नहीं है पर टॉनी के लिये यह स्वर्गीय आनंद प्राप्ति से कम ना था।
सन् १९८८ में रिटायर होने के पश्चात उसे हिमालय की वादियों और अनछुई ऊंची ऊंची पहाड़ियों में ट्रैकिंग की पुरानी दबी हुई आकांक्षा को पूरी करने का अवसर मिल गया। नेपाल-भ्रमण के मध्य, एक स्थानीय गाइड के आग्रह से फोर्त्से ग्राम को देखने के लिये चल दिया। चार दिनों की दुर्गम ऊबड़-खाबड़ चढ़ाई पहाड़ों की अनुपम धरोहर नज़ारों ने इस श्रमसाध्य यात्रा को भी सुगम बना दिया। गांव को देखकर वह मंत्रमुग्ध हो, स्तब्ध सा खड़ा रह गया। गाइड मुस्कुराते हुए उसके चेहरे के भावों को देखता रहा।
टॉनी का यह ग्राम-प्रेम क्षणभंगुर नहीं था। उसने गांव की भलाई के लिये अपनी आयु और अन्य उपलब्ध साधनों से क्षमतानुसार बहुत कार्य किया। दो दशकों से भी कम अवधि में उसने जो कार्य किया, बड़ा सराहनीय है।
गांव में शिक्षा और चिकित्सा की कोई व्यवस्था नहीं थी। गांव में एक स्कूल, एक मैडिकल सैंटर और ग्राम-अध्यापक के लिये एक घर बनवा दिया। गांव में पानी का उचित प्रबंध नहीं था। गांव ऊंचाई पर था। वहां तक पाइप-सिस्टम देकर गांव के इतिहास में एक और पन्ना जोड़ दिया।
आठ वर्षों तक वह योजनाओं की सफलता के प्रयास में गांव के गहन अंधकार में तेल के दीये के प्रकाश में काम करता रहा। गांव में बिजली नहीं थी जिसको यहां तक पहुंचाना बड़ा कठिन कार्य था। जहां चाह है, वहां राह भी मिल जाती है। भारत में निर्मित एक टर्बाइन मंगवाकर निकटवर्ती नदी पर स्थापित किया। गांव में वायरिंग आदि द्वारा लाने का काम भी सफलतापूर्वक संपन्न हो गया।
एक दिन सांयकाल के समय, उसने लोगों को इकट्ठा किया और एक ऊंचे स्थान पर खड़ा हो गया। अपने हाथों को फैलाकर चारों ओर घूमता हुआ बोला,

“लैट देयर बी लाइट!” (Let there be light! )

उसके साथी ने बिजली का स्विच दबा दिया और बरसों के टिमटिमाते दीयों को विदा किया। थोड़े समय के बाद लोगों ने यह चमत्कार भी देखा कि एक बटन के दबाते ही स्कूल, चिकित्सालय और अन्य स्थानों का अंधकार एक क्षण में ही चमकते प्रकाश में लुप्त हो जाता है। साधारण ग्रामीण धनाढ्य नहीं थे। उन्हें कम बिजली खर्च करने वाले बल्ब (energy-saving light bulbs)भी उपलब्ध होने लगे जिसमें १५ वॉट्स का बल्ब ७५ वॉट्स का प्रकाश देते हैं। लोगों को यह बिजली सस्ते दामों में दी जाती है। टॉनी फ्रीक को इस गांव से जो प्यार और प्रकृति की सुषमा का निर्बाध रसपान मिला है, उसने एवज में अपने अथाह परिश्रम के रूप में गांव को यह अनुपम प्रेमोपहार दिया।

टॉनी कहता है, मैं चाहे बार्नेट में रहता हूं पर मेरा दिल नेपाल में रहता है।

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महावीर शर्मा



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