महावीर

May 18, 2005

ससुराल से पाती आई है !

ससुराल से पाती आई है !

    ससुराल से पाती आई है !

बहुत हुए मैके में ही, सच तनिक न तबियत लगती है
भैया भाभी सो जाते हैं, लेकिन यह विरहन जगती है
कमरे की बन्द किवाङों से, मीठे मीठे स्वर आते हैं
वे प्यार की बातें करते हैं, अरमान मेरे जग जाते हैं
विश्वास करो मैं ने रातें तारों के साथ बिताई हैं

    ससुराल से पाती आई है !

चिट्ठी के मिलते ही प्रियतम, पहली गाङी से आ जाना
छत पर चढ़ बाट निहारूंगी , आने पर खाऊंगी खाना
बस अधिक नहीं लिख सकती हूं , इतने को बहुत समझ लेना
त्रुटियां चिट्ठी में काफ़ी हैं, साजन न ध्यान उन पर देना
हे नाथ तुम्हारी दासी ने आने की आस लगाई है ।

    ससुराल से पाती आई है !

पाती में बातें बहुत सी हैं, लज्जा आती है कहने में
जा कर बस लाना ही होगा, अब खैर नहीं चुप रहने में
दस बीस बार पढ़ पाती को, सोचा अब जाना ही होगा
पाजामे कुर्ते काफी हैं, एक सूट सिलाना ही होगा
पैसे की चिन्ता ही क्या है , ऊपर की खूब कमाई है

    ससुराल से पाती आई है !

दर्जी बोला इस सूट में तो , पूरा सप्ताह लग जायेगा
मैं ने सोचा सप्ताह में तो , मरने का ही खत आयेगा
सारे मित्रों पर हो आया पर, सूट सभी के छोटे थे
पत्नी की किस्मत फूटी थी , या भाग्य हमारे खोटे थे
देखा तो इधर मिला कूंआ, उस ओर बनी एक खाई थी ।

    ससुराल से पाती आई है !

बहुत सोचने पर जा कर, एक रैडीमेड खरीदा सूट
रंग बिरंगे मोजे पर फिर ,, पहन लिया बाटा के बूट
दाढ़ी मूंछ सफ़ा कर के , नयनों में काजल घाल लिया
फिर क्रीम लगा कर हल्की सी, ऊपर से पाउडर डाल लिया
सिलकन कमीज़ के ऊपर ही पहनी नीली नकटाई है ।

    ससुराल से पाती आई है !

तांगा कर स्टेशन पहुंचे , इतने में आई गाड़ी
पहले चढ़ने के चक्कर में , खिङकी से उलझ पैण्ट फाङी
डब्बे के अन्दर पहुंचे तो , स्थान न था तिल धरने को
मानो जैसे ससुराल नहीं , जाते हैं नरक में मरने को
पाकेट में डाला हाथ मगर देखा तो वहां सफाई है ।

    ससुराल से पाती आई है !

ससुराल के स्टेशन पर आ , मैं गाङी से नीचे आया
जब आंख उठा कर देखा तो टी.टी.आई सम्मुख पाया
मांगा उसने जब टिकट तो मैं बोला भैय्या मजबूरी है
कट गई जेब अब माफ़ करो , मुझ को एक काम ज़रूरी है
पर डाल हथकङी हाथों में , ससुराल की राह दिखाई है ।

    ससुराल की पाती आई है ।।महावीर शर्मा



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1 Comment »

  1. “अनुगूँज” में रवि भाई कहते हैं -
    ” चिट्ठियों के बीच ही, जीतू भाई ने भाई महावीर शर्मा की कविता “ससुराल से पाती आई है” का जिक्र किया. यह सारगर्भित, मजेदार, हास्य-व्यंग्य भरी कविता आपको हँसी के रोलरकोस्टर में बिठाकर यह बताती है कि प्रियतम की “ससुराल से पाती” “ससुराल की पाती” कैसे बन जाती है.
    इस चिट्ठी की कुछ पंक्तियाँ मुलाहजा फ़रमाएँ:

    ससुराल से पाती आई है !
    पाती में बातें बहुत सी हैं, लज्जा आती है कहने में
    जा कर बस लाना ही होगा, अब खैर नहीं चुप रहने में
    —-
    ससुराल के स्टेशन पर आ , मैं गाड़ी से नीचे आया
    जब आंख उठा कर देखा तो टी.टी.आई सम्मुख पाया
    मांगा उसने जब टिकट तो मैं बोला भैय्या मजबूरी है
    कट गई जेब अब माफ करो , मुझ को एक काम ज़रूरी है
    पर डाल हथकड़ी हाथों में , ससुराल की राह दिखाई है ।
    ससुराल की पाती आई है ।।

    उम्मीद है कि इस चिट्ठी से सीख लेकर, अब, हम, चाहे जितनी अर्जेंसी हो, चाहे जैसी भी प्यार भरी चिट्ठी तत्काल बुलावे का आए, अपनी यात्रा सोच समझ कर, जेबकतरों से सावधान रहकर करेंगे, नहीं तो हमारे ससुराल का पता बदलते देर नहीं लगेगी.”

    Comment by अनुगूँज — June 7, 2005 @ 4:06 pm

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