महावीर

April 13, 2005

“हम गधे हैं” - नीरज त्रिपाठी

Filed under: हास्य-रस/व्यंग्य — महावीर @ 10:40 pm

हम गधे हैं neeraj_tripathi.jpg

नीरज त्रिपाठी

एक दिन हुई एक गाधे से मुलाकात
हुई हमारी मित्रता, शुरू हुई बात
मैं ने पूछा गधे भाई
क्या आप वास्तव में गधे हैं
गधा बोला आपका प्रश्न सुनकर
लगता है कि आप गधे हैं

मै ने बात बिगड़ती देख
वार्तालाप को दूसरी ओर घुमाया
बहुत स्मार्ट लग रहे हो
गधे को बताया
गधे ने प्रशंसा के लिये
आभार जताया
खुश हो कर ढैंचू ढैंचू का
मधुर स्वर सुनाया

मैं ने पूछा गधे भाई
क्या कार्य-क्षेत्र है तुम्हारा
गधा बोला इम्पोर्ट ऐक्सपोर्ट का
व्यापार है हमारा
गधा बोला बहुत दिन बाद
मिला कोई अपने जैसा
क्या करते हो,
काम चल रहा है कैसा?

मैं बोला कविताएं लिखता हूं यार
गधा बोला अभी थोड़ा काम है
चलता हूं, नमस्कार!
मैं बोला मज़ाक कर रहा था यार

कम्प्यूटर के क्षेत्र में
करियर को दे रहा हूं नये आयाम
सुबह से लेकर शाम तक
तुम्हारी तरह करता हूं काम

गधा बोला वैसे कम्प्यूटर में
रुचि तो मेरी भी थी
लेकिन डैडी के व्यापार को
मेरी जरूरत थी

मैं बोला हम बेवकूफ़ इन्सान को
गधे कहते हैं
क्या तुम्हारी बिरादरी के लोग इस से
रुष्ट रहते हैं

गधा बोला इन्सान को गधा कहने पर
हमें नहीं विरोध
लेकिन गधे को इन्सान कहा
तो ईंट से ईंट बजा देंगे
दुलत्तियों की सज़ा देंगे
करेंगे प्रतिरोध

माना कि तुम्हारे यहां भी
कुछ लोग चारा खाते हैं
छोटे छोटे बच्चे हमारी तरह
बोझ उठाते हैं
और कुछ इन्सान वैसे ही गाते हैं
जैसे कि हम रैंकते हैं
लेकिन हमारे यहां
कोई थोड़ी सी भी बेईमानी करे
उसे बिरादरी से निकाल फेंकते हैं

टेढ़ों के लिये टेढ़े ,
सीधों के लिये सीधे हैं
गर्व है कि हम गधे हैं

गधे ने मुझ पर
कुछ यूं प्रभाव जमाया
मैं लगा सोचने भगवान ने मुझे
गधा क्यों नहीं बनाया

अब तो यही इच्छा है
कि ज़िन्दगी में कुछ ऐसा कर जाऊँ
समाज में, बिरादरी में
हर जगह गधा कहलाऊँ !

नीरज त्रिपाठी

April 12, 2005

सौ वर्ष बीत गये

Filed under: महावीर शर्मा, लेख — महावीर @ 12:09 am

*सौ वर्ष बीत गये*

सामान्यतः लेखक नारी के सौन्दर्य अथवा उसके असाधारण और अद्भुत कार्यों पर अपने विचारों को लेखनी से निकलते हुए शब्दों को पाठकों तक पहुंचाने के लिये किसी सुप्रसिद्ध महत्वपूर्ण महिला को ही अपने विषय का आधार बनाता है। झांसी की रानी, अहिल्या बाई, चाँद बीबी, जोन आफ आर्क - कितने ही उदाहरण आंखों के समक्ष आते हैं।

किन्तु मैं एक साधारण १०० वर्षीय महिला का उल्लेख कर रहा हूं जिसके दीर्घ जीवन-काल में पूरा युग समाया हुआ है।प्रसिद्ध न होते हुए भी मेरी दृष्टि में वह असाधारण है जो सौ साल पहले भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी। आज ऐसे कितने व्यक्ति हैं जो अपना मानसिक-सन्तुलन बनाये हुए १००वीं वर्ष-गांठ मनाने का स्वप्न साकार कर पाते हैं । कितने ही लोग शताब्दी शब्द के अधूरे स्वप्न लिये हुए——!! खैर! छोड़िये।

जी हां, आप भी मिलिये ‘श्रीमती मिली मार्कस ’ से - एक यहूदी महिला जो लन्दन बॉरो आफ बार्नेट (इंगलैंड) में सैंकड़े का आंकड़ा पार कर ३ अप्रैल २००५ को तीन पीढ़ियों के सहित १००वां जन्म-दिवस मना रही थीं।

‘मिली’ के चेहरे पर गहरी झुर्रियों के पीछे कितने सुखमय और दुःखभरी यादें छिपी पड़ी होंगीं - दो विश्व महा-युद्ध के भीषण दृश्य, ऐटामिक बम के निर्मम संहार से हीरोशामा (६ अगस्त, १९४५) और नागासाकी का ध्वंस, साठ लाख यहूदियों को हिटलर निर्माणित गैस चैम्बर के दोज़ख की आग में ज़िन्दा पुरुष,स्त्रियों और अबोध बालकों को धकेल देना या निहत्थे यहूदियों को गोलियों की बौछार में मृतक शरीरों को बिना क्रिया-कर्म के जला देना - ये सब ह्रदय-विदारक घटनायें उनके मस्तिष्क को पल पल कचोटती रहती है किन्तु ‘मिली’ के ह्रदय की धड़कन आज भी सौ वर्ष की आयु में घड़ी की तरह टिक टिक कर रही है। वह वास्तव में असाधारण नारी है!

‘मिली’ दुःख और सुख के सामञ्जस्य तथा मानसिक-सन्तुलन का रहस्य भी जानती है। अच्छी घटनाओं ने उसे जीवित रहने का साहस भी दिया है। आंखों के समक्ष तीन पीढ़ियों को फलते-फूलते देख कर वो पुरानी खोई हुई मुस्कुराहट उसके होंटों पर देख सकते हो। उसकी झुर्रियों के पीछे कुछ पुराने सुःखद क्षणों की स्मृतियां भी उसके ह्रदय को सम्भाले हुए हैं - राजा और रानियों के विवाह, राज्य-अभिषेक, राजकुमार और राजकुमारियों के जन्मों के शुभ-अवसर, न भूलने वाली याद जब भूतपूर्व प्रिन्स आफ वेल्स तथा ड्यूक आफ विन्डसर एडवर्ड ने एक अम्रीकन विवाह-विच्छेदित महिला के प्रेम में ११ दिसम्बर १९३६ को समस्त विश्व के राज्य को तिलाञ्जली दे कर सिद्ध कर दिया कि ‘ प्रेम सर्वोपरि है ‘ (याद रहे कि उस समय ब्रिटिश-राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता था)- बस इन्हीं यादों की नाव को जीवन-सरिता में खेते हुए आज भी काल को पीछे धकेल कर मुस्कुरा रही हैं ।

लन्दन के एज्वेयर क्षेत्र में सिड्मर लॉज रिटायरमेण्ट होम ‘ में अपनी जीवन-यात्रा के अन्तिम चरण में भी बात करते समय उनके होंठों पर एक मुस्कुराहट देख सकते हैं जिस में गाल और खिंच जाने से झुर्रियां और भी गहरा जाती हैं। आज भी पूरे उत्साह से औरेंज ट्री रेस्तराँ में बड़ी धूम-धाम से अपने सखा-सहेलियों, दो बेटों (बैरी तथा स्टैन्टन), बहुओं, पांच पौत्र एवं पौत्रियों, नौ पड़-पौत्रों सहित १००वां वर्ष मना रही थीं। प्रैस संवाद-दाताओं का झमघट होने से ‘मिली’ के मुख पर एक अनोखी सी आभा झलकने लगी। कहने लगीं, ” मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई कि प्रैस भी इस समय पर बधाई देने आये हैं। मुझे विश्वास ही नहीं होता था कि मैं वास्तव में १०० वर्ष की हो गई हूं - मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता।”

‘मिली’ के पिता पोलैण्ड से इंग्लैण्ड में सन् १८८० में आये थे और ‘मिली’ का विवाह ‘ श्री फ़िलिप मार्कस ‘ से १९२७ में समपन्न हुआ। ये लोग अधिकतर एसेक्स में रहे किन्तु द्वितीय विश्व-युद्ध में इनका घर-बार और सब कुछ बमबारी से ध्वस्त होने के कारण वहां से स्थानान्तर के लिये बाध्य होना पड़ा। पुरानी यादें सताती हैं,अभी भी कहती हैं, “हम सब सैलर में (भुईंधरा) में रहते थे और बिना कपड़ों के गली में जान बचाने के लिये भागना पड़ा क्योंकि मकान बिल्कुल धराशयी हो चुका था। वह दृश्य बहुत ही भयावह था!”- कहते कहते उनकी आंखों और चेहरे की झुर्रियों में एक भय और रोष का मिश्रण झलकने लगा। ‘मिली’ अभी भी मानसिक रूप से सजग और सतर्क है।कितने ही सुहावने और कभी वेदना-युक्त दिनों की कहानियां सुनाती रही।

खेद है, उनके पति यह दिन देखने के लिये वहां नहीं थे। उनका ६४ वर्ष की आयु में सन् १९७० में देहान्त हो गया।

हमारी ओर से ‘मिली’ और उनके परिवार के लिये अनेकानेक शुभकामनाएं प्रेषित हैं।

काश ! सारे भारतवासियों को भी आयु में ‘मिली’ की तरह शतक ….” मैं इस वाक्य को अधूरा ही छोड़ देता हूं क्योंकि कभी कभी शुभकामनाएं भी अभिशाप बन जाती हैं।

यदि भारत में हर व्यक्ति को १०० वर्ष जीवित रहने का वरदान मिल जाये तो क्या होगा??

आज कितने ही लोग आतंकियों की गोलियों और घातक धमाकों की बली पर चढ़ जाते हैं, कितनी ही बालिकाओं के लिये माँ के गर्भाशय शमशान बन जाते हैं- उनका दोष यह है कि विधाता ने उन पर ‘बेटी’ नाम की मुहर लगा दी थी।कितने ही माफिया के आतंक से, प्रकृति के कोप से चाहे वह त्सुनामि हो या भूकम्प हो, ज्वार-भाटा या अनावृष्टि हो, डॉक्टरों की धन-लोलुपता और नकली दवाओं के कारण निर्धन लोगों की सड़कों पर लाशें, रेल-दुर्घटनाओं से जो समाचार-पत्रों में एक बार छपने के पश्चात जिनकी लाशें भी लुप्त हो जाती हैं, भ्रष्टाचार की आग्नि में न जाने किस किस की आहुति होम हो जाती हैं —सूची अनन्त है!

हर क्षण काल के मुख में असंख्य लोग खिंचे जा रहे हैं किन्तु भारत की संख्या आज भी १०० करोड़ तक पहुंच गई है।

‘हर भारतवासी को १०० वर्ष की आयु मिले’ - मेरी यह शुभकामनाएं फलीभूत हो जाये तो क्या होगा — जन-संख्या विस्फोट !!!

महावीर शर्मा

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April 5, 2005

इधर उधर से

Filed under: सामान्य/General — महावीर @ 12:15 am

२४ अप्रैल २००५ vaisakhi 1.jpg

लन्दन में वैसाखी का उत्सवः
की सड़कों पर पारंपरिक वेश-भूषा से सुसज्जित ‘पञ्ज प्यारों’
की अगुआई में शानदार जुलूस निकलेगा और प्रसिद्ध ट्रफाल्गर

स्क्वेयर में दिन के ११.३० बजे धार्मिक कार्य-क्रम चलेगा।
इसके
अतिरिक्त भारतीय संगीत, लंगर (मुफ्त भोजन) और रंगा-रंग ट्रफाल्गर स्क्वेयर कार्य क्रम सांय ५ बजे तक चलता रहेगा। वैसे तो, वैसाखी १३-१४ अप्रेल को मनाया जाता है। यू. के. के विभिन्न नगरों औ गुरुद्वारों में इस अवसर पर यह उत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है।

April 2, 2005

इधर उधर से

Filed under: सामान्य/General — महावीर @ 9:42 pm
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जॉन पॉल द्वितीय का निधन

८४ वर्षीय कैथलिक ईसाई के धर्म गुरु जॉन पॉल द्वितीय का शनिवार, २ अप्रैल २००५ को

स्थानीय समयानुसार रात के ९. ३७ बजे वेटिकन सिटी में उनके आवास में निधन हो गया।

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ब्रिटिश पार्लियामेन्ट में श्री राम नवमी

हाउस आफ कॉमन्स (ब्रिटिश पार्लियामेन्ट) में १५ मार्च २००५ के दिवस पहली बार ‘श्री राम नवमी’ (भगवान श्री राम का जन्म-दिवस) का त्यौहार मनाया गया। इसमहत्वपूर्ण सर्व-दलीय उत्सव का श्रेय श्री टॉनी मैकनल्टी, मिनिस्टर आफ ट्रान्स्पोर्ट, उनके सलाहकार श्री अभय लखानी तथा हिन्दू काउन्सिल (यू.के)को जाता है।पहले भी समय समय पर इस प्रकार के अन्य उत्सव मनाये गये हैं। भारतीय प्रवासियों को आशा है कि इस प्रकार के उत्सव ब्रिटिश पार्लियामेन्ट में हर साल मनाये जायेंगे।

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दो नए हिन्दी ब्लाग

हिन्दी-ब्लाग-जगत में दो बड़े सुन्दर ब्लाग का आगमन हुआ है। मनोशी चटर्जी की ‘मानसी’ और दीपा जोशी का ‘अल्पविराम’ - दोनों ही ने उच्चकोटि की कविताएं ले कर ब्लाग जगत में प्रवेश किया है। संक्षेप में, मनोशी और दीपा चिट्ठाकारों के लिये अनभिज्ञ नहीं हैं। इन की कविताएं ‘अनुभूति’, ‘नई हवा’, ‘काव्यालय’ तथा ‘साहित्यकुञ्ज’ आदि जाल घरों में प्रकाशित होती रहती हैं। आशा है इनकी सारी कविताएं शीघ्र अब संग्रह-रूप में ‘मानसी’ तथा ‘अल्पविराम’ में पढ़ने का अवसर मिलता रहेगा।

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