महावीर

March 30, 2005

विरह की अगन जलाये रे !

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 4:25 pm

विरह की अगन जलाये रे !

फागुन की मस्त बयार चले, विरह की अगन जलाये रे।
हरे वसन के घूंघट से तू सरसों क्यों मुस्काये रे?

नगर नगर और ग्राम ग्राम में अबीर के बादल छाये
प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे।

चाँद की शीतल किरनों से शृंगार किया मैं ने अपना
अँसुवन से नयनों का काजल, बार बार धुल जाये रे।

फगुआ, झूमर चौताला जब परवान चढ़ी जाये
ढोल, मँजीरे और मृदंगा , तुम बिन जिय धड़काये रे।

बीत ना जाये ये फागुन भी, जियरा तरसे होली खेलन
गीतों की गमक, नृत्यों की धमक, सब तेरी याद दिलाये रे।

कागा इतना शोर मचाये, लाया है सन्देश पिया का
मधुकर भी मधु-रस पी पी कर, फूलों पर मँडराये रे।

हरे वसन के घूंघट से सरसों भी मुख चमकाये रे ! !

महावीर शर्मा



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