महावीर

March 24, 2005

शब गुज़र ना जाये !

इन्तज़ार! (उर्दू में एक बेतुकी  कविता)

शब गुज़र ना जाये, है इन्तज़ार-ए-यार का
बस शौक़ है हमें तो दीदारे-यार का।

मन्ज़र जुदाईयों का देखा गया ना हम से
छुटता नहीं है दामन, अब ख्याले-यार का।

गोशाये-तन्हाई में तारीकी हर समत
दीदार होगा कैसे तस्वीरे-यार का।

डर है कहीं छीन ले अख्त्यारे-तसव्वर
तसव्वर ही है सहारा दिले-दाग़दार का।

तूफ़ान से तो लड़ने में लुत्फ़ ही और है
ले कर सहारा बह चले विसाले-यार का।

देखा है एक बारगी जलवाये-हुस्न-यार
भूलेगा नज़ारा कूचाये-यार का।

ग़ैरों की बात का एतबार क्या करें
अब तो भरोसा ना रहा वफ़ाये-यार का।

इस लड़खड़ाती ज़िन्दगानी के सफ़र में
मिल जाये किसी मोड़ पर जलवाये-यार का।

ज़िन्दगी की शाम पर मिल जाये एक बार
रूह करेगी शुक्रिया अहसाने-यार का।।
महावीर शर्मा

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होली है या…. ?

Filed under: कविता, महावीर शर्मा — महावीर @ 4:48 pm

होली है या…. ?

फागुन की मस्त बयार लिये होली का अवसर आया है
हरे वसन के घूंघट से सरसों ने मुख चमकाया है

हर नगर नगर और ग्राम ग्राम में , अबीर के बादल छाये
टेसू के फूलों के रंग से, भर बालक पिचकारी लाये
हर आने जाने वाले पर, पङती फुहार पिचकारी की
लहंगा भीगा, चुनरी भीगी, कंचुकी भीगी पनिहारी की
मुस्काती सी वह निकल गई, रग रग में यौवन छाया है
हरे वसन के घूंघट से सरसों ने मुख चमकाया है

घर घर में रहने वाले सब, बालक सोते से जाग गये
अपनी मां से पैसे ले कर, रंग लेने बाहर भाग गये
लाये जेबों में भर भर गुलाल, रंग लाल हरा पीला धानी
जो भी मिलता रंगते उसको, करते सब अपनी मनमानी
मानो केवल धनवानों ने होली का पर्व मनाया है
हरे वसन के घूंघट से सरसों ने मुख चमकाया है

धनवानों के बच्चे मिल कर उस कुटिया के बाहर आये
दो दिन से भूखा वह बालक कैसे रंग के पैसे लाये
मन मारे फिर भी बेचारा कुटिया से बाहर आया है
हरे वसन के घूंघट से सरसों ने मुख चमकाया है

सब बच्चे आगे निकल गये धरती पर कुछ बिखरा गुलाल
बालक ने उसका रंग देखा, सोचा कि रक्त भी तो है लाल
फिर पटक वहीं सर धरती पर, मुख लाल किया उसने अपना
देखो माँ होली खेल आज साकार किया मैं ने सपना
जा कर माता की गोदी में उसने निज प्राण गंवाया है !
हरे वसन के घूंघट से सरसों ने मुख चमकाया है

महावीर शर्मा

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