महावीर

January 25, 2005

“तुम आना !”सारिका कल्याण

Filed under: कविता — महावीर @ 5:05 pm

तुम आना !

आसमान की हथेली से जब
सूरज फिसलने लगे
कत्थई रंग में जब शाम
अपने को रंगने लगे
अरमान मचलने से लगे
लबों की थिरकन
दिल की धड़कन बन
तुम को आवाज़ दे
तुम आना !

दस्तक दे कर दिल पे
और मैं
पलकों के झरोके से
तुम्हें देख पाऊं
आना कि

पलकों के बन्द होते ही
तुम्हारी दुनिया में खो जाती हूं
आना कि

हर ख़्वाब में इंतज़ार तुम्हारा रहता है
यादों में आना तुम!
याद है इक रोज़
तुमने वो गुलाबी फूल दिया था
आज भी वो सूखा फूल
मेरी किताब में सोता है
जब भी तुम मेरे ख़्वाब में आते हो
वो फिर से खिल उठता है
तुम्हारी मुस्कान की तरह
आना कि

तुम्हारे आने से
सब कुछ नया नया सा लगता है
आना कि

उस फूल को खिलने की
अक्सर इन्तज़ार रहता है
आना तुम एक बार फिर!!

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