महावीर

September 1, 2004

” हुस्न बेनक़ाब “

मेरी यह नज़्म उर्दू “जगत” साप्ताहिक में 16. 9. 1964 के अंक में प्रकाशित हुई थी । कुछ तबदीलियों के साथ नीचे पेश कर रहा हूँ ।

” हुस्न बेनक़ाब “


हुस्न बेनक़ाब का दीदार क्या किया !
रखे कदम सम्भाल कर , पर डगमगा रहे हैं ।

चढ़ती जवानी के, जरा अन्दाज़ तो देखो,
खून से हमारे ही, मेहंदी रचा रहे हैं ।

आतिश है ये कुछ ऐसी , ता उम्र बुझ सके ना
ये आग दिल में मेरे , ऐसी लगा रहे है ।

सुना है उन से हम को उल्फ़त ज़रा नहीं है
नज़रों से नज़रें बार बार क्यों मिला रहे हैं ।

नज़र तिरछी करके, इक आग सी लगा दी,
नज़्द आ लबों से फिर, क्यों बुझा रहे हैं ।

सम्भल तो जाऊँ लेकिन , सज़ा ही ऐसी दी है ,
आया ज़रा सा होश में, , फिर से पिला रहे हैं ।

महावीर शर्मा

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