” हुस्न बेनक़ाब “
मेरी यह नज़्म उर्दू “जगत” साप्ताहिक में 16. 9. 1964 के अंक में प्रकाशित हुई थी । कुछ तबदीलियों के साथ नीचे पेश कर रहा हूँ ।
” हुस्न बेनक़ाब ” (बेतुकी कविता)
हुस्न बेनक़ाब का दीदार क्या किया !
रखे कदम सम्भाल कर , पर डगमगा रहे हैं ।चढ़ती जवानी के, जरा अन्दाज़ तो देखो,
खून से हमारे ही, मेहंदी रचा रहे हैं ।आतिश है ये कुछ ऐसी , ता उम्र बुझ सके ना
ये आग दिल में मेरे , ऐसी लगा रहे है ।सुना है उन से हम को उल्फ़त ज़रा नहीं है
नज़रों से नज़रें बार बार क्यों मिला रहे हैं ।नज़र तिरछी करके, इक आग सी लगा दी,
नज़्द आ लबों से फिर, क्यों बुझा रहे हैं ।सम्भल तो जाऊँ लेकिन , सज़ा ही ऐसी दी है ,
आया ज़रा सा होश में, , फिर से पिला रहे हैं ।महावीर शर्मा






