Archive for August 31st, 2004

जाम तोड़ दिया साक़ी ने

मेरी यह नज़म उर्दू “जगत” साप्ताहिक में 7. 10. 1964 के अंक में प्रकाशित हुई थी ।
(उर्दू की एक बेतुकी कविता)
जाम तोड़ दिया साक़ी ने, कोई बात नहीं,
आंखों से ही [...]

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