महावीर

August 20, 2004

उनकी अदा

मेरी यह नज़म उर्दू “मिलाप” साप्ताहिक (लन्दन) में 12. 7. 1967 के अंक में प्रकाशित हुई थी ।

“उनकी अदा” (एक बेतुकी कविता)

करके वादा भूल जाना, है अदा है ये ख़ास उनकी
गर दिलाया याद फिर भी, है ज़ुबाँ ख़ामोश उनकी ।

बारहा समझाया मैं ने यूं ना तोङो दिल किसी का
जायेगी मुरझा कली जब, कद्र होगी फिर न उनकी ।

क्यों लगा है दिल धङकने यूं अचानक बैठे बैठे
छुप सके ना बज़्म में हम, पङ गई है नज़र उनकी ।

नज़रे करम हो ग़ैर पर, मुझ पर ग़ज़ब आलूद क्यों
हम तो फिर भी जी ही लेंगे, हो जफ़ायें कम न उनकी ।

उनके आने की उम्मीदें, जिन्दगी का है सबब
मर न जायें हम ख़ुशी से, ख़बर सुन आने की उनकी ।

गर हमें मालूम होता इश्क के अन्जाम का
दिल लगा तारे फ़लक पर, याद में गिनते न उनकी ।

महावीर शर्मा

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