उनकी अदा
मेरी यह नज़म उर्दू “मिलाप” साप्ताहिक (लन्दन) में 12. 7. 1967 के अंक में प्रकाशित हुई थी ।
“उनकी अदा” (एक बेतुकी कविता)
करके वादा भूल जाना, है अदा है ये ख़ास उनकी
गर दिलाया याद फिर भी, है ज़ुबाँ ख़ामोश उनकी ।
बारहा समझाया मैं ने यूं ना तोङो दिल किसी का
जायेगी मुरझा कली जब, कद्र होगी फिर न उनकी ।
क्यों लगा है दिल धङकने यूं अचानक बैठे बैठे
छुप सके ना बज़्म में हम, पङ गई है नज़र उनकी ।
नज़रे करम हो ग़ैर पर, मुझ पर ग़ज़ब आलूद क्यों
हम तो फिर भी जी ही लेंगे, हो जफ़ायें कम न उनकी ।
उनके आने की उम्मीदें, जिन्दगी का है सबब
मर न जायें हम ख़ुशी से, ख़बर सुन आने की उनकी ।
गर हमें मालूम होता इश्क के अन्जाम का
दिल लगा तारे फ़लक पर, याद में गिनते न उनकी ।
महावीर शर्मा






