महावीर

August 31, 2004

जाम तोड़ दिया साक़ी ने

मेरी यह नज़म उर्दू “जगत” साप्ताहिक में 7. 10. 1964 के अंक में प्रकाशित हुई थी ।

(उर्दू की एक बेतुकी कविता)

जाम तोड़ दिया साक़ी ने, कोई बात नहीं,
आंखों से ही पी लूंगा ।
गरेबां चाक़ हुआ उल्फ़त में, कोई बात नहीं,
हर चाक़ को सी लूंगा ।

अपनों ही से इस क़दर सदमे उठाये उम्र भर,
मैं जिन्हें अपना समझता, था मेरी आंखों का फेर,
ग़म का साया साथ है , ज़ख्मे दिल आये उभर,
ज़ीस्त का पैग़ाम सुन क्यों आंखों में अश्कों की देर,
इक दिल और हज़ारों ग़म हैं , कोई बात नहीं,
हर हाल में जी लूंगा।

<साक़ी पिला दे इतनी कि रहें न होश में हम,
बस मैकदे में समझूं , मैं खुदा हो गया हूं ,
दिल ले लिया था हंस कर , अब हो गये क्यों बरहम ?
लगता है ख़ुद से अब तो कि जुदा हो गया हूं ,
साग़र भी नहीं , नज़रें भी नहीं , कोई बात नहीं ,
अश्कों को ही पी लूंगा !!

महावीर शर्मा

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August 20, 2004

उनकी अदा

मेरी यह नज़म उर्दू “मिलाप” साप्ताहिक (लन्दन) में 12. 7. 1967 के अंक में प्रकाशित हुई थी ।

“उनकी अदा” (एक बेतुकी कविता)

करके वादा भूल जाना, है अदा है ये ख़ास उनकी
गर दिलाया याद फिर भी, है ज़ुबाँ ख़ामोश उनकी ।

बारहा समझाया मैं ने यूं ना तोङो दिल किसी का
जायेगी मुरझा कली जब, कद्र होगी फिर न उनकी ।

क्यों लगा है दिल धङकने यूं अचानक बैठे बैठे
छुप सके ना बज़्म में हम, पङ गई है नज़र उनकी ।

नज़रे करम हो ग़ैर पर, मुझ पर ग़ज़ब आलूद क्यों
हम तो फिर भी जी ही लेंगे, हो जफ़ायें कम न उनकी ।

उनके आने की उम्मीदें, जिन्दगी का है सबब
मर न जायें हम ख़ुशी से, ख़बर सुन आने की उनकी ।

गर हमें मालूम होता इश्क के अन्जाम का
दिल लगा तारे फ़लक पर, याद में गिनते न उनकी ।

महावीर शर्मा

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